बुधवार, 29 जून 2011

roshni ke pl jga

                  रौशनी के पल जगा 
                                - राज सक्सेना 

उठ अँधेरी  रात में कुछ ,  रौशनी  के  पल     जगा |
जिस तरह सम्भव बने,एक जगमगाता कल बना |
स्वप्न क्या-क्या रातभर,सब देखते हैं     नींद   में,
उठ खड़ा हो सत्य की,  उनमें कहीं  कोंपल     लगा |
लोग चलते फिर रहे हैं, धूप  से तन   को      बचा,
धूप से जब हों विकल तब, छाँव का आंचल   सजा |
हो नरम धरती तो आकर, हल चलाना  बात  क्या,
ढूंढ़ कर ऊसर धरा पर, वीर बन कर     हल    चला |
लोग  जब गिरने लगें तो, किस कदर जाते हैं गिर,
जब पतन सम्भव लगे तो, हो खड़ा उठ कर   दिखा |
सह रहे हैं मौन रह कर , अब भी शोषण लोग क्यों,
`राज` अब शोषण नही, कहना उन्हें   केवल  सिखा |

  - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 (उ.ख)
                                 मो- 09410718777

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