मंगलवार, 7 जून 2011

rn men utre ab ramdev

                   रण में उतरे अब रामदेव 
                                                                    -  डा ० राज सक्सेना 
इंडिया बने  भारत   स्वदेश,
हों दूर धरा के सकल क्लेश |
एक लाल जना भारत माँ ने,
ले सन्यासी का नवल वेश |

उठ स्वामी ने   भ्रकुटी  फेरी,
बज गयी समर की रणभेरी |
आक्रामक योग दिखेगा अब,
नभ योग पताका फिर फहरी |

जागा भारत का स्वाभिमान,
सब अधिकारों   को गये जान |
हर मन में योग  मशाल जली, 
हो गये सजग निज भ्रकुटी तान |

जो सिखा   रहे    थे बैर    यहाँ,
फिरकापरस्त  की खैर    कहाँ |
जितना करना  कर चुके भ्रष्ट ,
बाँधो बिस्तर अब   जाओ जहाँ |

बाबा  की  दृष्टि  पड़ी  तुम  पर ,
भग जाओ यहाँ से बच-बच कर |
जो   कमा  चुके  वो रखो   यहाँ,
बस दो कपड़े रख  लो तन   पर |

भारत   माँ   के   सच्चे    सपूत ,
निर्धन   जनता    के      देवदूत |
 ले कर    पतंजलि योग-ज्योति ,
आये बन कर तुम      क्रांतिदूत |

जन-जन के बन कर सत्यमेव ,
हो   शत्रु ,   भ्रष्ट    के    एकमेव |
सम्पूर्ण    राष्ट्र    की  पीड़ा    ले ,
रण  में   उतरे ,  अब  राम  देव |

        धनवर्षा,हनुमान मन्दिर ,
             खटीमा- 262308

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