शुक्रवार, 10 जून 2011

mhapran nirala

                 महाप्राण निराला 
                                           -राज सक्सेना 

थे `समरेखा` से सरल हृदय,वक्री स्वभाव के नायक तुम |
लय से कविता में प्राण फूंक, थे जन-कविता के गायक तुम |
व्यक्तित्व अलग था कविता का, जो मेल कहीं पर खा न सका,
कविता में क्रांति मशाल लिए, थे नवकविता सम्वाहक तुम,


समझा अछूत तुमने कंचन, परित्याग निराला था तेरा |
जो जैसा था रखना सम्मुख, सम्भाग निराला  था   तेरा |
स्वान्त: सुखाय लेखन तेरा, जन-जन का लेखन बना सदा,
हर विधा अतुल थी जीवन की, हर भाग निराला था तेरा |


व्यक्तित्व निराला सूर्यकान्त, कविता का रूप निराला था |
सपने रच कर विक्रय न किये, तू स्वयमसिद्ध मतवाला था |
मदमस्त रहा हाथी जैसा, विचलन पथ से अपने न किया,
हे महाकवि, साहित्य-रथी,एक युग तूने रच डाला था  |


जब तूने वर्षागीत लिखा, आया बसंत में भी अषाढ़ |
हर विरहगीत में भर कर करुणा, पिघलाए कितने ही पहाड़ |
तुम हंसे-हंसी जनता सारी, रोए तो जनता रोती थी ,
हे महाश्रेष्ठ ,जनता के कवि, तुम कवियों में थे महाप्राण |
                                 -धनवर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308

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