रविवार, 26 जून 2011

mere mn ko

                 मेरे मन को 
                             - राज सक्सेना 
अधर रसपान प्रियतम का, लगा अमृत मेरे मन को |
युगों की प्यास का तर्पण, हुआ अनुभव मेरे तन को |
सभी में कुछ न कुछ कमियां, नहीं कोई कमी तुम में,
सहेजा जिस तरह तुमने, उठी हर एक उलझन    को |
हमें भर पूर जीना है, जियेंगे हम हर एक पल   को,
सिमटकर क्यों जियें करलें ,गठित मजबूत बंधन को |
सुलगती प्यास इस तन में, मगर मन वर्जना में है,
चलो अब खत्म कर दें हम,अजब इस एक अनबन को |
मिलन की कामना मन में, कसक बन कर न रह जाये,
उठो हम एक कर डालें, क्षुधित हो तप रहे      तन को |
न रोको अब करो निश्चय, समा जाओ  मेरे तन में ,
बनाएं `राज` मन्दिर हम, भटकते फिर रहे मन    को |

          - धन वर्षा, हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308

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