गुरुवार, 30 जून 2011

aik ghr chahiye

                    एक घर चाहिए 
                                 - राज सक्सेना 

स्वप्न अपने पूर्ण करने, सबको एक घर चाहिए |
मैं परिंदा हूँ मुझे उड़ने को,       दो    पर    चाहिए |
फ़िक्र-ए-जनता में लगे , रहते हैं सारी उम्र वो- ,
नाश्ते से हर डिनर तक, मॉल  सब तर    चाहिए |
यूँ तो हैं त्यागी पुरुष, दौलत से इनको  काम क्या,
अपने दस्खत तब करेंगे, पहले तै   जर   चाहिए |
काम तब आतीं दुआएं, साफ   दिल  से हों  अता ,
साथ में दरिया-दिली और, चश्म-ए -तर   चाहिए |
इन्सान में खामी न हो , ये तो कभी     होता   नहीं ,
भगवान न बन जाये इन्सां, रहना  कसर  चाहिए |
उड़ते-उड़ते थक कर गिरुं बस,तेरे घर के सामने,
`राज` पल भर ही सही, मुझको भी तो दर चाहिए |

  - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 (उ.ख)
                           मो- 09410718777

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