सोमवार, 23 मई 2011

lava bhr diya shiraon men

लावा भर दिया शिराओं में  

कविता से भर कर राष्ट्र-प्रेम ,
सब की बलहीन भुजाओं में /
सुलगा दी मैंने आग   प्रबल ,
लावा भर दिया   शिराओं में /

गिद्धों से   सदा   लड़ा  हूँ मैं,
मुर्दों की    जाकर  बस्ती में /
रक्तों में   ज्वाला  फूंकी   है,
बिजली भर दी है  हस्ती में /

अधिकार मांगना सिखला कर,
फूंके    हैं    प्राण  कराहों में /
सुलगा दी मैंने आग   प्रबल ,
लावा भर दिया   शिराओं में /

मैं उसे   जगाता   फिरता  हूँ,
जो खुली आँख से सोया     है /
पीड़ा को नियति समझा   है,
कर्मों के फल में    खोया   है /

मैंने    झकझोरा   है  उसको,
लाया हर सत्य    निगाहों में /
सुलगा दी मैंने आग   प्रबल ,
लावा भर दिया   शिराओं में /

है त्याज्य और क्या ग्राह्य रहे ,
मैंने आख्यान      सुनाये  हैं  /
क्यों राजनीति से दूर      रहें,
प्रतिकार उन्हें    समझाये हैं /

भर दिया शोर्य और शक्ति को,
उनकी निष्प्राण    निगाहों  में /
 सुलगा दी मैंने आग   प्रबल ,
लावा भर दिया   शिराओं में / 


          ( डा० राज सक्सेना )
   धन वर्षा, हनुमान मन्दिर,
खटीमा-२६२३०८(उत्तराखंड)
मो-  , ०८५७३२०९९९  , 09410718777

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