बुधवार, 1 जून 2011

chnd ashaar

               चंद अशआर

करेंगे कुछ हंसीं बातें,  सुनेंगे खुशनुमा नगमे |
चलो आगाज़ करते हैं, सुहानी शाम का यारो  |

ये महफिल है शरीफों की, शरीफों की तरह रहिये|
अगर कोई शिकायत है, अदब के साथ कुछ कहिये|

मत उलझ हम से अमीरे कारवां, ये सोच ले |
जिन्दगी हम से उलझ कर, चैन से अब तक नहीं |

खामियां मुझ में जो हैं, रहती रहें तो ठीक हैं |
मैं  मुकम्मल हो गया तो, देवता हो जाऊंगा |

मेरे गीतों से सियासत, दूर रख मेरे रकीब |
फूल से नाज़ुक बदन हैं, धूप में मुरझाएंगे |

                बच्चा

आँख से जब एक बच्चे की, जो टपकी बूंद तो |
कुछ दिनों अंगार के बिस्तर पे सोना पड़ गया |

किसी निर्धन के बच्चे की, कभी आँखों में झांकोगे,
किसी शाला के सपनों से, सजी होंगी बुझी आँखें |

सियासत में धकेलो मत, अभी मासूम हैं बच्चे |
सियासत की कलाबाज़ी, इन्हें बर्बाद कर देगी |

मंहगी किताब फ़ीस ने मायूस कर दिया |
निर्धन कोई शाला गया, वापस निकल गया |

बड़े हैं उम्र से अपनी हमारी दौर के बच्चे |
हमीं कम उम्र में इनको, बड़ा बनना सिखाते हैं |

              बुज़ुर्ग

बूढ़ा हुआ जो बाप तो ,     बोझा हुआ बहुत  |
बच्चों ने उसको सहन के, कोने में रख दिया |

पैरों पे क्या खड़े हुए, बच्चे अलग हैं `राज` |
ये भूल कर के बाप है, कंधे  की आस में |

बरगद की तरह छाया, जिसकी वो समझते थे |
हर शाख लगे उलझन, सूखे हुए शजर की |

इस दौरे तरक्की में, ऊंचाई से गिरने पर,
बढ़ कर जो सहारा दे, दामन नहीं मिलता |

पीढ़ी नई हमेशा, चढ़ता हुआ सूरज है ,
पर डूबते सूरज की, हर शान निराली थी |

ये शजर फलदार न हो, धूप से साया तो है,
इसकी एक-एक शाख में, मां का है आंचल  छुपा |

हिंदी की कहानी में, उर्दू के भी किस्से को,
एक साथ मिला दें तो, इतिहास बदल जाये |

१८-

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