मंगलवार, 17 मई 2011

निभा सकता हूँ मैं 
डॉ० राज सक्सेना
पाक रिश्ता प्यार का, दिल से निभा सकता हूँ मैं,
एक धोका क्या हजारों , इसमें खा सकता हूँ मैं /
हर  जरा  सी  बात  पर,  इंकार  करने  की अदा ,
भूल कर, नाज़-ओ-अदा, नखरे उठा सकता हूँ मैं /
आड़  रिश्तों  की  लिए,  देते  रहे  वो  दर-फरेब, 
आजमालें, फिर भी उनके, काम आ सकता हूँ मैं /
देखिये मुझ को बुला कर, आग के दरिया में चल ,
आप से मिलने कहीं भी, हंस के आ सकता हूँ मैं /
शौक  से ले  लीजिये,  जैसे  जहाँ  जो   इम्तिहाँ,
आप हैं कातिल मेरे,  सब  से छुपा सकता हूँ मैं / 
चैन खोकर इश्क में, लगता है क्यूँ कुछ मिल गया,
`राज` उनके नाम पर, मिट कर दिखा सकता हूँ में /

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