शनिवार, 7 मई 2011

छांट कर
  हैं तो इंटर ही मगर ,  लिखते हैं खुल कर डाक्टर,
छे : किताबें लिख चुके हैं, टीपकर और फाँट कर /
उम्र छिया-सट है मगर, अब तलक भी लव गुरु,
चेलियाँ रखते हैं अपनी, हर जगह पर छांट कर /
यूँ तो मिलता ही नहीं, उनको प्रकाशक छाप दे,
बांटते फिरते हैं अपनी, पुस्तकें खुद छाप कर /
भोज पर उनको बुलाओ, एक बोतल चाहिए,
न व्यवस्था हो अगर,मंगवाएं खर्चे काट कर /
अनवरत पीते हैं सिगरेट, पान खाते साथ में,
खा रहे हैं टोस्ट-मक्खन, आप हम से मांगकर /
इनके हाथों में सुरक्षित, आज का साहित्य  है /
लिखवा रहे नव लेखकों से, सौ किताबें छांटकर /
साहित्य के मार्तण्ड हैं ये, है नहीं इनका जवाब,
`राज`जब मिलने को जाओ,ये भगाएं डांट कर /



सरताज है हिंदी

भारत के सर की शान है, सरताज है हिंदी /
दुनिया की हर जबान से, मुमताज़ है हिंदी /
सारे  जहाँ में इससे कोई, मीठी जुबां नहीं ,
भारत के पोर-पोर की, आवाज़ है हिंदी /
कोना कोई  नहीं बचा, चलती जहाँ न हो,
हर दिल में बज रहा है, वही साज़ है हिंदी /
यूँ तो लदा है देश, गहनों से हर तरह ,
गहनों में भी सिरमौर का अंदाज़ है हिंदी /
चंदा सी दिलनशीन है, तारों सी दिलरुबा,
हर दिल में गूंजता, सही  अल्फाज़ है हिंदी /
करने को बहुत कुछ है, हिंदी की लताफत में,
हर दिल अजीज़ ,एक  जुबां,`राज`है हिंदी /


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