मंगलवार, 3 मई 2011

 लोकतंत्र की अंतर्कथा 
रिश्वत हमारा मजहब, चंदा हमारा वन्दन /
रटते हैं नाम धन का ,पैसा है सिर्फ चिन्तन /
स्विस बैंक में जमा हों ,खरबों रूपये हमारे,
छोटा सा लक्ष्य इतना, करते यही प्रबन्धन /
पैसे से  हम खरीदें ,भारत के वोटरों को,
फिर खून उनका चूसें,संसद में कर के मंथन /
टेक्सों की दर बढ़ाते, पर खुद को माफ़ करके,
टैक्सों से कोष भरते, निर्धन का नोंच कर तन /
दुनिया के ऐश जमकर ,ये टैक्स ही तो देंगे,
हम क्यों सुनेंगे कितना, जनता मचाये क्रन्दन /
निर्धन रहे न भारत , धनवान शीघ्र हों हम,
गुर ढूंढने इसी का, हम भी गये थे लन्दन /
भारत के लोग भूखे, मिलती नहीं है रोटी,
सिक्सटी इयर से गम में,हम खा रहे हैं मक्खन /
हो ठीक देश में सब, कोशिश करें सतत हम,
लड्वाएं जातियों को, धर्मों में है व्यवस्थन /
टुकड़ों में देश बांटे, कोशिश ये कर रहे हैं,
कब `राज` देश बेचें , हम कर रहे हैं मंथन /   

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