सोमवार, 2 मई 2011

लीडरी पैदा हुइ  
हैवानियत इंसानियत पर , जिस घड़ी शैदा हुई /
फाड़ कर उसका उदर फिर, लीडरी पैदा हुई /
चालाकियों, मक्कारियों का, दूध जब इसने पिया ,
तब कही इस फितरती में, तीरगी पैदा हुई /
और जब नस-नस में इसके,मुफ्तखोरी आ बसी,
तब उछल कर दल बदल की बानगी, पैदा हुई /
भेड़िये की दुष्टता जब, गीदड़ी मन में भरी,
चालबाजी में सिमट कर,सादगी पैदा हुई /
झूट में लालच मिला और जा घुसा मस्तिष्क में,
जहनियत तब धीरे-धीरे, बिष भरी पैदा हुई /
आकाश चढ़ कर काइयांपन , पा गया उंचाइयां ,
तब कहीं उसकी जुबान-ए-फितरती पैदा हुई /
दुष्टता का हाथ में परचम उठा कर जब चला,
मन में भी शैतान के तब , त्रासदी पैदा हुई /
`राज` धोखा,ध्रष्टता  के साथ धमकाने का रस,
भर दिया तो भाषणों की, फुलझड़ी पैदा हुई /

विकल्प  

नहीं बहुमत मिला तो फ्रंट ही खोले हुए हैं /
बना करते थे पत्थर के, सभी पोले हुए हैं /
जरूरत खास है यह जानकर, अपने सभी अब,
पिटारे मांग के हंसकर, कहीं खोले हुए हैं /
करोड़ों खर्च करके ही, पहुंच पाए हैं संसद में,
मिले पद और जर जमकर, जबीं खोले हुए हैं /
कई नेता विकल्पों पर,अड़े हैं देखिये क्या हो,
सचिव कानून टेबल पर, वहीं खोले हुए हैं ,
सभी कुछ चाट लें मिलकर ये चाहें तन्त्र के पुर्जे,
मगर नेता सुपर हो कर, बने भोले हुए हैं /
सियासत में बने कुछ मॉल जैसे `राज` सम्भव हो,
विकल्पों पर विकल्प अपने, सभी खोले हुए हैं /
 

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