बुधवार, 25 मई 2011

bal kavitayen

परीकथा

सोने जैसे पंख हिलाती,
सोनपरी     आ     जाती /
नीलगगन सी आँखों वाली,
माँ जब   कथा   सुनाती /

मुझे नींद   में    पाते ही ,
चुपके  से        सहलाती /
और उठा अपनी गोदी में,
दूर   गगन    ले   जाती /

उपर आसमान में उड़ना,
लगता कितना     प्यारा /
लगते खेत क्यारियों जैसे,
घर     डिब्बी    सा सारा /

माँ सी सुंदर परी आँख में,
निंदिया    मेरी     पाती /
चुपके से आकर धरती पर,
माँ  के   पास    सुलाती /

नींद टूटती जब मेरी तो,
माँ  फिर  परी   बुलाती /
परीकथा माँ के कहते ही,
मुझे   नींद  आ    जाती /

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