मंगलवार, 31 मई 2011

maithili shran sht-sht pranam

मैथिली शरण  शत -शत  प्रणाम


कवि कोविद,कविवर,कविललाम ,
मैथिली शरण, शत-शत   प्रणाम  !

अंतर तक    छूकर,   सतत  मर्म,
हिंदी    को   माना,     राष्ट्र-  धर्म!
हिन्दीमय ,    भारत    कर  डाला,
कर अतुल परिश्रम, अथक कर्म !

लिख यशोधरा ,   साकेत -धाम !
मैथिली शरण, शत-शत  प्रणाम  !

साहित्य     क्षेत्र के    सूर्य सजग,
कर   डाला  हिंदी-जग    जगमग !
यूँ   तो  कवि  कितने  हर युग में,
पर  तुमने सबसे   लिखा  अलग,

लिख  अविचल, अविरल, अविराम 
मैथिली शरण, शत-शत    प्रणाम  !

पड़   गयी   तुम्हारी  , जब  छाया,
हिंदी   का   स्वर्णिम   युग  आया !
कर  क्षेत्र  नियत , अति श्रेष्ट लिखा,
तब श्रेष्ठ राष्ट्र-कवि,   पद     पाया !

हो   गया  सूर्य सा , प्रखर    नाम ,
मैथिली शरण, शत-शत   प्रणाम  !







maithili shran sht-sht pranam

मैथिली शरण  शत -शत  प्रणाम 
मैथिली शरण  शत -शत  प्रणाम 
मैथिली शरण  शत -शत  प्रणाम 
मैथिली शरण  शत -शत  प्रणाम 



सोमवार, 30 मई 2011

baith kar sinhasnon pr

       बैठ कर सिंहासनों पर, 
                                   -  राज सक्सेना

बैठ कर   सिंहासनों   पर, वो   खुदा सा हो गया !
मुझ में उसमें अब बड़ा एक ,फासला सा हो गया!
मौत का डर जब मेरे,मन मस्तिष्क से जाता रहा,
ज्वालामुखी से प्यार का, एक सिलसिला सा हो गया !
टूट कर   पतवार ने, जब से   दिया  धोखा    मुझे
अब भंवर  में   तैरने  का, होंसला   सा हो  गया !
देखिये  नाकामियों  की ,  कामयाबी  का   सिला,
दुश्मने जां भी बदल कर, अब भला सा  हो गया !
दीनदुनिया छोड़कर , जिसके लिए मैं मिट गया,
इन दिनों वो भी बदल कर, बेवफा   सा  हो गया !
क्या वजह है `राज`कुछ भी, अब समझ आता  नहीं  ,
इश्क  भी इस  दौर  का कुछ , बेमज़ा सा हो गया 
               धनवर्षा , हनुमान मन्दिर, खटीमा -262308  
               ( उत्तराखंड )  मोबा- 09410718777

शनिवार, 28 मई 2011

kuchh ashaar

लीडरों   की   नंगई   के हैं   बड़े चर्चे   मगर,
हम्माम में इस दौर के नंगे खड़े हैं लोग सब /

सिलसिलाये बदगुमानी, क्या कभी होता है कम,
आ गले मिल दोस्त, फिर से बावफा हो जाएँ हम /

तन बिक गया बाज़ार में, थोड़े से धान में,
बिखरी पड़ी है लाज एक ऊँचे मकान    में ,
सपना यही था क्या मेरे आज़ाद मुल्क का,
जनता का ये भविष्य है, भारत महान  में /

sartaj hai hindi

सरताज है हिंदी

भारत के इत्तिहाद का, अल्फाज़ है हिंदी /
सब की यही जुबान है, हमसाज़ है हिंदी /
सारे जहाँ में इससे कोई मीठी जुबां नहीं,
हर दिल में गूंजती हुई, आवाज़ है हिंदी /
कोना कोई बचा नहीं, चलती जहाँ न हो,
सपनों का तरक्की के, परवाज़ है हिंदी /
उठ के चली तो फिर कभी पीछे नहीं देखा,
दुनिया की हर जुबान की, सरताज है हिंदी /
गहनों से ज़ुबानों की, कामिल है देश फिर भी,
गहनों में ये सिरमौर है, मुमताज़ है हिंदी /
चंदा सी दिलनशीन है, तारों सी आबदार ,
सबसे अलग मुकाम का, अंदाज़ है हिंदी /
बहनों की तरह देश में, रहतीं हैं जुबानें,
सर पे सजा है सबके, वही ताज है हिंदी /
कहने को बहुत कुछ है, हिंदी की लताफत में,
हरदिल अज़ीज़, नेक जुबां, `राज`है हिंदी / 

hindi se amit prem

हिंदी से अमिट प्रेम 

भर कर हिंदी से अमिट प्रेम,
मैंने   दिग्भ्रांत  युवाओं   में /
हिन्दीमय सबको कर   डाला,
लावा भर दिया   शिराओं में /

काले   अंग्रेजों  से   लड़ कर,
भारत की बस्ती-बस्ती   में /
रक्तों   में     ज्वाला  फूंकी है ,
हिंदी   भर  दी है  हस्ती  में /
सुलगाकर मनमें आग प्रबल ,
फूंके  नव  -प्राण प्रभाओं में /
भर कर हिंदी से अमिट प्रेम,
मैंने   दिग्भ्रांत  युवाओं   में /

मैं   उसे   जगाता  फिरता  हूँ,
जो  खुली   आँख  से  सोया है /
अंग्रेजी  पढना नियति  मान ,
एक   दिवा-स्वप्न में खोया है /
मैंने   झकझोरा  है     उसको,
लाया  हूँ    सत्य   निगाहों में /
भर कर हिंदी से अमिट प्रेम,
मैंने   दिग्भ्रांत  युवाओं   में /

है त्याज्य और क्या ग्राह्य रहे,
मैंने   आख्यान      सुनाये हैं /
क्यों निज भाषा से प्रेम   करें,
गुण-अवगुण सब समझाये हैं /
हिंदी के ध्वज और कीर्तिदंड ,
धरकर बलशील भुजाओं में /  
हिन्दीमय सबको कर   डाला,
लावा भर दिया   शिराओं में /

बुधवार, 25 मई 2011

dm-dmaak dm kre madari

डम-डमाक, डम करे मदारी 
                           - राज सक्सेना 

डम-डमाक, डम करे मदारी,
बन्दर          चाल    दिखाए /
कंधे पर  रख  कर के  लाठी ,
विदा       कराने          जाए /

देख-देख   बन्दर    राजा को,
बंदरिया                मुस्काए /
सजी-धजी   ढेरों  गहनों   से,
अपनी    कमर        हिलाए /

जब बन्दर कहता चलने को,
नखरे   बहुत          दिखाए  /
हाथ जोड़ता    बन्दर उसके,
तब    राजी   हो          जाये  /

ठुमक ठुमक चल पड़ी बंदरिया ,
जब      ससुरे    में      आये  /
डाल शीश  पर एक    ओढनी  ,
घूंघट     में     छुप        जाए  /

  धनवर्षा, हनुमान मन्दिर,
खटीमा-262308 (उ.ख.)
  मो- 09410718777

suraj ghr jata

सूरज जब घर जाता 
-raj saxena 
दिन की भाग दौड़ से थक कर,
सूरज    जब     घर      जाता /
चंदा  लेकर   बहुत      सितारे,
नभ  में  नित - नित     आता /

आँख  मिचौली   क्यूँ होती ये,
समझ   न    मैं   यह     पाता /
माँ-पापा     समझ  न    पाते,
भैया    चुप         रह      जाता /

पकड़  में   मेरी      दादा-दादी ,
एक   दिवस    जब        आये / 
मैंने      अपने     प्रश्न  सामने ,
उनके        सब         दोहराए /

सुनकर      दादा-दादी     बोले,
कारण    बहुत      सरल     है /
सूरज   को  घर  भेजा   जाता,
फिर    वो    आता    कल    है /

अगर  नहीं  जायेगा  घर   तो,
कल        कैसे           आएगा /
इसी    तरह  आते-जाते    ही ,
सन-डे     फिर           आएगा /

 dhan varsha , hanuman mndir,
khatima-262308(uttrakhand)

bal kavitayen

परीकथा

सोने जैसे पंख हिलाती,
सोनपरी     आ     जाती /
नीलगगन सी आँखों वाली,
माँ जब   कथा   सुनाती /

मुझे नींद   में    पाते ही ,
चुपके  से        सहलाती /
और उठा अपनी गोदी में,
दूर   गगन    ले   जाती /

उपर आसमान में उड़ना,
लगता कितना     प्यारा /
लगते खेत क्यारियों जैसे,
घर     डिब्बी    सा सारा /

माँ सी सुंदर परी आँख में,
निंदिया    मेरी     पाती /
चुपके से आकर धरती पर,
माँ  के   पास    सुलाती /

नींद टूटती जब मेरी तो,
माँ  फिर  परी   बुलाती /
परीकथा माँ के कहते ही,
मुझे   नींद  आ    जाती /

सोमवार, 23 मई 2011

lava bhr diya shiraon men

लावा भर दिया शिराओं में  

कविता से भर कर राष्ट्र-प्रेम ,
सब की बलहीन भुजाओं में /
सुलगा दी मैंने आग   प्रबल ,
लावा भर दिया   शिराओं में /

गिद्धों से   सदा   लड़ा  हूँ मैं,
मुर्दों की    जाकर  बस्ती में /
रक्तों में   ज्वाला  फूंकी   है,
बिजली भर दी है  हस्ती में /

अधिकार मांगना सिखला कर,
फूंके    हैं    प्राण  कराहों में /
सुलगा दी मैंने आग   प्रबल ,
लावा भर दिया   शिराओं में /

मैं उसे   जगाता   फिरता  हूँ,
जो खुली आँख से सोया     है /
पीड़ा को नियति समझा   है,
कर्मों के फल में    खोया   है /

मैंने    झकझोरा   है  उसको,
लाया हर सत्य    निगाहों में /
सुलगा दी मैंने आग   प्रबल ,
लावा भर दिया   शिराओं में /

है त्याज्य और क्या ग्राह्य रहे ,
मैंने आख्यान      सुनाये  हैं  /
क्यों राजनीति से दूर      रहें,
प्रतिकार उन्हें    समझाये हैं /

भर दिया शोर्य और शक्ति को,
उनकी निष्प्राण    निगाहों  में /
 सुलगा दी मैंने आग   प्रबल ,
लावा भर दिया   शिराओं में / 


          ( डा० राज सक्सेना )
   धन वर्षा, हनुमान मन्दिर,
खटीमा-२६२३०८(उत्तराखंड)
मो-  , ०८५७३२०९९९  , 09410718777

itihas likhunga main

              इतिहास लिखूंगा मैं 


कवि हूँ इतिहास लिखूंगा मैं,
कालजयी सी शिला प्रखर में /
खोजो तो निश्चित पा लोगे ,
मुझ को लड़ता कहीं समर में 

सृजक रहा हूँ विजयों का ही,
शब्दजाल में नहीं फंसा  मैं /
बिकती होंगी कविताएँ पर ,
कविता के संग नहीं बिका मैं /

मन से बांचो कविता मेरी,
मिल जाऊंगा उड़ता स्वर में /

खोजो तो निश्चित पा लोगे ,
मुझ को लड़ता कहीं समर में  /

विरुदावलियाँ गाकर कितने,
शाह सरीखे बने       भिखारी /
पर    दरबारी     चाटुकारिता,
मैंने कभी नहीं      स्वीकारी /

भ्रष्ट व्यवस्था के   विरुद्ध मैं,
डटा रहा हूँ , खड़ा डगर     में /  
खोजो तो निश्चित पा लोगे ,
मुझ को लड़ता कहीं समर में  /

लगा    रहे   हैं मोल    हमारा,
माँ के वसनों के       व्यापारी /
धरती का   सारा  धन  देकर ,
दे दें   अतुल सम्पदा      सारी /

किन्तु रहूँगा   अविचल रण में,
राष्ट्र-धर्म  रख  लिया शिखर में /
खोजो तो निश्चित पा लोगे ,
मुझ को लड़ता कहीं समर में  /

                 ( डा० राज सक्सेना )
धनवर्षा, हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 
( उत्तराखंड )
मो- ०९४१०७१८७७७, ०८०७३२०९९९ 

मंगलवार, 17 मई 2011

निभा सकता हूँ मैं 
डॉ० राज सक्सेना
पाक रिश्ता प्यार का, दिल से निभा सकता हूँ मैं,
एक धोका क्या हजारों , इसमें खा सकता हूँ मैं /
हर  जरा  सी  बात  पर,  इंकार  करने  की अदा ,
भूल कर, नाज़-ओ-अदा, नखरे उठा सकता हूँ मैं /
आड़  रिश्तों  की  लिए,  देते  रहे  वो  दर-फरेब, 
आजमालें, फिर भी उनके, काम आ सकता हूँ मैं /
देखिये मुझ को बुला कर, आग के दरिया में चल ,
आप से मिलने कहीं भी, हंस के आ सकता हूँ मैं /
शौक  से ले  लीजिये,  जैसे  जहाँ  जो   इम्तिहाँ,
आप हैं कातिल मेरे,  सब  से छुपा सकता हूँ मैं / 
चैन खोकर इश्क में, लगता है क्यूँ कुछ मिल गया,
`राज` उनके नाम पर, मिट कर दिखा सकता हूँ में /

सोमवार, 16 मई 2011

वरिष्ठ नागरिक संदेश

हम त्याज्य नहीं हैं, कण भर भी, 
हम  अब   भी , ढाल तुम्हारी हैं  /
शोला    चाहे   बुझ  गया  मगर,
फिर   भी   अंदर    चिंगारी     हैं

अवसर दो हम को हम अब भी,
अनुभव   से  जग  महका  देंगे / 
जिस  ओर   पड़ी  बंजर  धरती ,
हम  उसमें   फसल , उगा   देंगे /

भुजबल  से भले  नहीं   सक्षम ', 
हम  मन   से  सब  पर  भारी हैं 
शोला    चाहे   बुझ  गया  मगर,
फिर   भी   अंदर    चिंगारी   है / 
 ;

खोने   को अपने   पास है   क्या , 
पाने   को    यह   संसार   पड़ा  / 
जिस दिन मन   में ठानेंगे  हम ,
कर   देंगे   एक  तूफान    खड़ा /

हासिल   कर   लेंगे   जो   चाहें , 
इच्छित जितने    मन-हारी  है /
शोला   चाहे   बुझ गया   मगर ,
फिर   भी   अंदर    चिंगारी    हैं /

रविवार, 15 मई 2011

सरताज है हिंदी 

भारत के सर की शान है, सरताज है हिंदी,
दुनिया की हर जुबान से, मुमताज़ है हिंदी /
शाहिद है उड़ानों की, मेरे मुल्क की ये ही,
अर्श-ए-बरीं मकाम तक, परवाज है हिंदी /
सारे जहाँ में इससे कोई, मीठी जुबां नहीं,
भारत के पोर-पोर की आवाज़ है हिंदी /
पग-पग पे मिलींहमको  कितनी ही जुबानें,
है पाक उनमें सबसे, सुखन-ताज है हिंदी /
कोना कोई बचा नहीं, चलती जहाँ न हो,
हर दिल में बज रहा है, व्ही साज़ है हिंदी /
चंदा सी दिलनशीन है, तारों सी आबदार,
दुनिया में गूंजता हुआ, अल्फाज़ है हिंदी /
बहनों की तरह देश में, रहतीं हैं ये दोनों,
उर्दू है भक्ति-भाव, अजां- नमाज़ है हिंदी /
कहने को लताफत में कोई लफ्ज़ नहीं है,
हर दिल अज़ीज़, एक जुबां `राज`है हिंदी /

शनिवार, 7 मई 2011

छांट कर
  हैं तो इंटर ही मगर ,  लिखते हैं खुल कर डाक्टर,
छे : किताबें लिख चुके हैं, टीपकर और फाँट कर /
उम्र छिया-सट है मगर, अब तलक भी लव गुरु,
चेलियाँ रखते हैं अपनी, हर जगह पर छांट कर /
यूँ तो मिलता ही नहीं, उनको प्रकाशक छाप दे,
बांटते फिरते हैं अपनी, पुस्तकें खुद छाप कर /
भोज पर उनको बुलाओ, एक बोतल चाहिए,
न व्यवस्था हो अगर,मंगवाएं खर्चे काट कर /
अनवरत पीते हैं सिगरेट, पान खाते साथ में,
खा रहे हैं टोस्ट-मक्खन, आप हम से मांगकर /
इनके हाथों में सुरक्षित, आज का साहित्य  है /
लिखवा रहे नव लेखकों से, सौ किताबें छांटकर /
साहित्य के मार्तण्ड हैं ये, है नहीं इनका जवाब,
`राज`जब मिलने को जाओ,ये भगाएं डांट कर /



सरताज है हिंदी

भारत के सर की शान है, सरताज है हिंदी /
दुनिया की हर जबान से, मुमताज़ है हिंदी /
सारे  जहाँ में इससे कोई, मीठी जुबां नहीं ,
भारत के पोर-पोर की, आवाज़ है हिंदी /
कोना कोई  नहीं बचा, चलती जहाँ न हो,
हर दिल में बज रहा है, वही साज़ है हिंदी /
यूँ तो लदा है देश, गहनों से हर तरह ,
गहनों में भी सिरमौर का अंदाज़ है हिंदी /
चंदा सी दिलनशीन है, तारों सी दिलरुबा,
हर दिल में गूंजता, सही  अल्फाज़ है हिंदी /
करने को बहुत कुछ है, हिंदी की लताफत में,
हर दिल अजीज़ ,एक  जुबां,`राज`है हिंदी /


गुरुवार, 5 मई 2011

भ्रष्ट दरोगा स्तुति

हे कष्ट बढ़ायक खरे-खरे,
अपराध मिटायक मरे-मरे /
गुंडे और दुष्ट  लफंगों के,
सब उलटे सीधे काम करे /

खाकी खलनायक लट्ठ धरे,
अपराध सहायक पाल भरे /
जनता के भक्षक , हरे-हरे /

उलटे मुंह जन से बात करे,
बिनबात तमाचे चार धरे /
निर्दोष व्यक्ति को धमकाने,
डंडा दिखलाकर बात करे /

हे ख़ाल उतारक धरा-धरे,
नेता चरणों में सदा परे / 
जनता के भक्षक , हरे-हरे /

तुम से अपराधी सब हरषे,
निर्दोष बंद जल को तरसे /
बध-स्थल तक भी कांप उठे,
जब तेल लगा डंडा बरसे /

हे जुर्म-करायक दुष्ट अरे,
पैसे लेकर खुद कत्ल करे /
 जनता के भक्षक , हरे-हरे /

दुर्जन लोगों के पिता-मात,
आतंकी सर पर धरे  हाथ /
भागी बाला को पेशी से ,
पहले क्वाटर में रखे साथ /

हे नस्ल बिगाड़क सांड बुरे,
जो तुम करते कोई न करे /
जनता के भक्षक , हरे-हरे /

दीवान-सिपाही करें जाप,
थाना-आश्रम तुम गुरु-बाप /
दारू-हट्टी थाना लगता,
गरियाना करते शुरू आप /

खुद गली लायक काम करे,
दुष्टों में सबसे दुष्ट खरे /
जनता के भक्षक , हरे-हरे /

बेवर्दी लगते आप  खली ,
वर्दी पहनें तो महा बली /
चोरी-बटमारी में हिस्सा ,
दारू बिकवाते गली-गली /

गुंडा-उन्नायक सरा-सरे,
जन-गण को भय से त्रस्त करे /
जनता के भक्षक , हरे-हरे /

क्राइम करवाए धडा-धड़ी ,
फैला मजहब की शांत कढ़ी /
गाली-चांटे और डंडे से ,
इज्जत गिरवाता गली-गली /

लेकर फिरता पिस्तौल भरे,
एंन- काउन्टर में निर्दोष मरे /
जनता के भक्षक , हरे-हरे /
मेकप से ग्रांड मम्मा 

मेकप से ग्रांड मम्मा, दिखती जवान कमसिन ,
ढल तो चुका है सबकुछ, कसती कमान पलछिन /
पोतों की शादियों में, पहनें हैं जींस टाईट ,
होता है शार्ट  टाप-अप, हर साल और हर दिन /
करवा के सर्जरी वो, टाईट सी घूमती हैं,
खुद को लगीं समझने, नूतन जवान वरजिन /
जाती हैं रोज यूँ तो, जिम साथ फ्रेंड के वो,
ब्लाउज को रोज उनके, ढीला करे है दरजिन /
पोतों से कह दिया है, बोलें तो आंटी बस,
क्लब में जवान-कमसिन, लडके घुमाएं हरदिन /
पतिदेव अर्दली सा, रह मौन घूमता है,
भूले से कुछ भी बोला, उसको दिखाएँ दुर्दिन /
लटका दिया जो रब ने, टाईट कहाँ तलक हो ,
है `राज ` एक सीमा, रहलें यहाँ या बरलिन /

मंगलवार, 3 मई 2011

रिश्वतों की जब से उनकी,सैट हर गोटी हुई /
ताज से ऊँची उछल कर, घर की हर चोटी  हुई /
अब से पहले खुष्क रोटी,खा रहे थे मांग कर,
बेमज़ा उनके लिए अब, घी से तर रोटी हुई /
पड़ न जाये एक छापा, इससे डर दुबले हुए,
किन्तु पत्नी मॉल खाकर, हो निडर मोटी हुई /
जब से लडके को बताया,माल घर में है बहुत
हर बुरी आदत को ले, संतान हर खोटी हुई /
बढ़ रहा है जैसे-जैसे रिश्वती अम्बर अब,
शै हर एक उनकी नज़र में, गिर के अब छोटी हुई /
`राज` सुनकर गालियाँ भी,वो भड़कते अब नहीं,
ऐंठ कर अब ख़ाल उनकी, किस कदर मोटी हुई /
सब कुछ बदल गया है, बदले हैं सब मिजाज़ /
गिरगिट हुए हैं जैसे, इस दौर के रिवाज़ /
अंकल नहीं,चाचा नहीं, दादा न अब कहें ,
कम उम्र नौजवां भी, हमको पुकारें राज /
नर कररहा है नर से, मादा भी खुद से ब्याह ,
कैसे बढ़ेगा आगे, या रब तेरा समाज /
मरियम रही न मरियम,गीता ने लाज छोड़ी,
शर्म-ओ-हया नजर में, आँखों में कब लिहाज़ /
मां बन गयी ममी अब, पापा हुआ है डैड,
दादी भी चाहती है, जग-सुन्दरी का ताज /
उलटी बहाए गंगा , वो माड आजकल है,
बेटी के साथ मां भी,रखती है फ्रेंड आज /
कानों में `राज` हरदम, मौला पुकारता है,
दुनिया बदल गयी है, तू भी बदल मिजाज़ /
 लोकतंत्र की अंतर्कथा 
रिश्वत हमारा मजहब, चंदा हमारा वन्दन /
रटते हैं नाम धन का ,पैसा है सिर्फ चिन्तन /
स्विस बैंक में जमा हों ,खरबों रूपये हमारे,
छोटा सा लक्ष्य इतना, करते यही प्रबन्धन /
पैसे से  हम खरीदें ,भारत के वोटरों को,
फिर खून उनका चूसें,संसद में कर के मंथन /
टेक्सों की दर बढ़ाते, पर खुद को माफ़ करके,
टैक्सों से कोष भरते, निर्धन का नोंच कर तन /
दुनिया के ऐश जमकर ,ये टैक्स ही तो देंगे,
हम क्यों सुनेंगे कितना, जनता मचाये क्रन्दन /
निर्धन रहे न भारत , धनवान शीघ्र हों हम,
गुर ढूंढने इसी का, हम भी गये थे लन्दन /
भारत के लोग भूखे, मिलती नहीं है रोटी,
सिक्सटी इयर से गम में,हम खा रहे हैं मक्खन /
हो ठीक देश में सब, कोशिश करें सतत हम,
लड्वाएं जातियों को, धर्मों में है व्यवस्थन /
टुकड़ों में देश बांटे, कोशिश ये कर रहे हैं,
कब `राज` देश बेचें , हम कर रहे हैं मंथन /   

सोमवार, 2 मई 2011

लीडरी पैदा हुइ  
हैवानियत इंसानियत पर , जिस घड़ी शैदा हुई /
फाड़ कर उसका उदर फिर, लीडरी पैदा हुई /
चालाकियों, मक्कारियों का, दूध जब इसने पिया ,
तब कही इस फितरती में, तीरगी पैदा हुई /
और जब नस-नस में इसके,मुफ्तखोरी आ बसी,
तब उछल कर दल बदल की बानगी, पैदा हुई /
भेड़िये की दुष्टता जब, गीदड़ी मन में भरी,
चालबाजी में सिमट कर,सादगी पैदा हुई /
झूट में लालच मिला और जा घुसा मस्तिष्क में,
जहनियत तब धीरे-धीरे, बिष भरी पैदा हुई /
आकाश चढ़ कर काइयांपन , पा गया उंचाइयां ,
तब कहीं उसकी जुबान-ए-फितरती पैदा हुई /
दुष्टता का हाथ में परचम उठा कर जब चला,
मन में भी शैतान के तब , त्रासदी पैदा हुई /
`राज` धोखा,ध्रष्टता  के साथ धमकाने का रस,
भर दिया तो भाषणों की, फुलझड़ी पैदा हुई /

विकल्प  

नहीं बहुमत मिला तो फ्रंट ही खोले हुए हैं /
बना करते थे पत्थर के, सभी पोले हुए हैं /
जरूरत खास है यह जानकर, अपने सभी अब,
पिटारे मांग के हंसकर, कहीं खोले हुए हैं /
करोड़ों खर्च करके ही, पहुंच पाए हैं संसद में,
मिले पद और जर जमकर, जबीं खोले हुए हैं /
कई नेता विकल्पों पर,अड़े हैं देखिये क्या हो,
सचिव कानून टेबल पर, वहीं खोले हुए हैं ,
सभी कुछ चाट लें मिलकर ये चाहें तन्त्र के पुर्जे,
मगर नेता सुपर हो कर, बने भोले हुए हैं /
सियासत में बने कुछ मॉल जैसे `राज` सम्भव हो,
विकल्पों पर विकल्प अपने, सभी खोले हुए हैं /