गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

sahitsahchar

आँख न झपकी पल भर कल भी
आजभी अब तक जाग रहा हूँ .
कल से भूल भुलैया में ही
राह भटक कर भाग रहा हूँ .

है मुझको विश्वाश गईं तो
शायद कभी न आ पाओगी
पागल मन के वश में फिर भी
खड़ा द्वार पर ताक रहा हूँ .

तूफानों से नहीं डरा मैं-
हूँ भयभीत मिलन के पल से ,
फिर भी कभी मिलन हो जाये -
यही मनौती मांग रहा हूँ .

आकर कई अजनबी मुझसे -
रोज अकेले भी मिलते हैं ,
सिर्फ तुम्ही से मिलकर अपने -
मन के अंदर झाँक रहा हूँ .

दुनिया भर की गुत्थी मैंने -
सुलझाई है , लेकिन तुमने ,
खडी पहेली ऐसी करदी -
जिसके हल को भाग रहा हूँ .

नोंच परों को छोड़ गईं तुम -
स्वप्न लोक मैं "राज " अकेला ,
महामिलन की उम्मीदों के -
पुल सपनों मैं बाँध रहा हूँ

1 टिप्पणी:

  1. सौ नमन परम उपकारी को
    माता बन जीवन धारी को
    बेसुध अबोध को पाल पोस
    जो बड़ा करे उस नारी को

    तन की गोदी में हिला हिला
    जीवित रखती है दूध पिला
    परजीवी परवश हो काया
    निज श्रम से देती सदा जिला

    निस्वार्थ भाव से सेवा कर
    देती जीवन पग धारी को
    बेसुध अबोध को पालपोस
    जो बड़ा करे उस नारी को

    परिवार नियामक होकर भी
    सेवासन्तानों की करती
    संतुष्ट सभी को रखती है
    श्रम ज्वर से होती जलती भी

    है स्वंम अकेली उदाहरण
    न कोई बदल महतारी का
    बेसुध, अबोध को पाल पोस
    जो बड़ा करे उस नारी

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