बुधवार, 27 अप्रैल 2011

दर्द-ऐ-जनता जब कभी उनको सुनाने लग गये,
एक जरूरी कम से जाना,बताने लग गये /
फिर कहा, कोई यहाँ ,सुनता नहीं है दास्ताँ,
सिर्फ अपनी ही कहो , जग की सुनाने लग गये /
आप नेता हैं सभी के , जब कहा तो बोर हो,
दीन-दुनिया की हमें पट्टी पढ़ाने लग गये /
कल तलक जो कौम के बनते रहे थे रहनुमा,
हर जगह अपने चने बढकर बुनने लग गये /
बेहयाई ओढ़ कर, अब बन गये हैं वो दिलेर,
रिश्वतों के रेट खुद, सबको बताने लग गये /
पांच सालों से नहीं आये थे अपने क्षेत्र में,
हो गया घोषित इलेक्शन, रोज आने लग गये /
अध्यक्षता जब से मिली, एंटी-करप्शन बोर्ड की,
बे -झिझक हर डील में, हिस्सा बंटाने लग गये /
कल तलक रोटी न थी ,भरपेट इनके भाग्य में, 
एकड़ों में 'माल' दिल्ली में बनाने लग गये /
बेबसी है 'राज' अपनी ,है नहीं बस का निजाम ,
हो नहीं जब कुछ सका हम, सिर खुजाने लग गये /

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