शनिवार, 23 अप्रैल 2011

सूर्य किरन का नित्य सवेरे आना,अच्छा लगता है ,
हरी धरा पर सरसों बिछ जाना ,अच्छा लगता है /

रोज भोर में मन्दिर जाती माँ, और भरी दुपहरी,
शाळा से बच्चों का घर आना , अच्छा लगता है /

अर्ध रात्रि में दबे पांव ,जग-भर से छुप - कर ,
दग्ध हृदय ले मुझ तक आना,अच्छा लगता है /

भले देर से आती हो तुम,महामिलन को प्रियतम ,
पर आते ही मुझ पर छा जाना, अच्छा लगता है /

नित्य भोर में मुझे पाश में, ले सो जाना पलभर को भी,
कंचन काया से बंध कर सो जाना,अच्छा लगता है /

मिलन घड़ी के पल-पल का दोहन करतीं तुम,
स्वयम रूठ कर मुझे मनाना,अच्छा लगता है /

सोते-सोते मीठी निंदिया में , जब मुस्काती तुम,
बिना बात यूँ ही मुस्काना , अच्छा लगता है /

नहीं चाहिए उम्र बहुत लम्बी सजनी बिन तेरे,
भंवरे सा तेरे संग जल जाना, अच्छा लगता है /

'राज' जान पर बन आती,जब जाती हो तुम,
अच्छा जाती हूँ कहकर ना जाना,अच्छा लगता है /

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