गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

पति जागरण गीत 

तीन दिन से हिचकियाँ ले क्यों रहा है तिलमिला ,

मातमी सूरत हटाकर, खत्मकर ये सिलसिला /
चार दिन की जिन्दगी है , काटता क्यों इस तरह ,
मेमना मत बन जरा सा शेर भी बन कर दिखा /

भीम का कुलदीप है तू ,रत्न दारा वंश का ,
हरकुलिस सा तन सधा है ,रक्त जिसमे कंस का /
खा रहा है तू खली के, जब बराबर मॉल तब ,
फिर भला पत्नी से तुझको डर लगे किस बात का/

देख कर बीबी की सूरत कांपता रहता है क्यों,
मूड कब हो ठीक उनका भांपता रहता है क्यों /
जब निकल जाती है शापिग, पर्स तेरा छीनकर ,
आँख उल्लू सी बड़ी कर, टापता रहता है क्यों /

माह का पहला दिवस है, आज तो कुछ ताव खा,
शेर से बकरी बनी ,बीबी को ऊँगली पर नचा /
तीस दिन के बाद आएगा, ये शुभ दिन लौट कर,
आज तो वेतन दिवस है, आज रंगदारी दिखा /

आज के दिन देवता सी, हो रही है वन्दना,
शेष दिन तो काटना हैं , तुझको उल्लू सा बना/
रात को बच्चे सुला कर,जब भी आये लक्ष्मी,
जागता हो फिर भी सोने का उसे नाटक दिखा /

उनतीस दिन सौभाग्य यूँ, नेपथ्य में रहता तेरा,
तीसवें दिन भाग्य से आता है सिंगल दिन तेरा /
जेब पर पड़ जाय डाका, उससे पहले बेवकूफ ,
चंद घड़ियाँ ही सही, स्वर्णिम उन्हें लेना बना /

सामने बीबी के कल से तू खड़ा मिम्याएगा ,
बस किराये के लिए तू, हाथ नित फैलायगा /
नोकरों से दिन कटेंगे , सब्जियां लायेगा तू ,
लेट हो जाये तो खाना, खुद लगा कर खायेगा /

तीस दिन बिस्तर तेरा खाली रहेगा जान जा ,
चाय, खाना,बस किराया,ही मिले पहचान जा /
इस लिए रिश्वत से अपनी जेब को मजबूत कर,
रोज पत्नी जेब चैकिग के लिए आती रहेगी जानजा /

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