रविवार, 17 अप्रैल 2011

जब लजा कर लगीं तुम हृदय से प्रिय -
देखने को हजारों सपन मिल गए /
बुझ गयी प्यास कितने जनम की मेरी -
जब हमारे -तुम्हारे नयन मिल गये /

कल्पना को मिली एक नव ज्योति अब -
हमको उनके हृदय में जगह क्या मिली 

यह धरा अब हमें स्वर्ग लगने लगी -
कल्पना लोक को शत नयन मिल गये /

तन के भूगोल में खो गए इस तरह -
घाटियाँ  और शिखर आ फिसलते रहे,

देखने हम लगे फिर से दिन में सपन,
मुक्त विचरण को कितने चमन मिल गये /

मौन रह कर भी करते रहे बात हम -
अंक से अंक का मौन भाषण हुआ ,

नैन से नैन जुड़ कर जडित हो गये -
अंग से अंग करके मनन मिल गए/  

न रहा याद कुछ, भूल सब कुछ गए -
सिर्फ मै रह गया ,और तुम रह गये,

वर्जनाएं सभी ढह गयीं "राज " फिर -
धुल में जग के सारे कथन मिल गये /


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