गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

आभास है !

भूख ,भय,भावुक -भयानक भेद का सहवास है  /
शब्दश : सम्यक ,सतत -सहमा हुआ परिहास है /

और भी गजलें उजागर कर रही हैं मुद दआ ,
किन्तु मेरी हर गजल , मजबूर का अहसास है /

चल पड़ा हूँ बस अकेला , भेदने  यह चक्र व्यूह ,
डर नहीं मन में ज़रा , या कष्ट का संत्रास है /

में अँधेरी कोठरी में , ढूंढता हूँ एक किरण,
रौशनी की बात करना, ही जहाँ बकवास है /

हैं अँधेरी रात , जुगनू तक कोई दिखता नहीं,
किन्तु मन में सूर्य सा, हरदम भरा उल्लास है/

'राज' गज़लें आयेंगी, आती रहीं हर दौर में,
मेरी ग़ज़लों में मगर, हर दौर का आभास है /


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें