गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

ममता राज


1 टिप्पणी:

  1. आँख न झपकी पल भर कल भी
    आजभी अब तक जाग रहा हूँ .
    कल से भूल भुलैया में ही
    राह भटक कर भाग रहा हूँ .

    है मुझको विश्वाश गईं तो
    शायद कभी न आ पाओगी
    पागल मन के वश में फिर भी
    खड़ा द्वार पर ताक रहा हूँ .

    तूफानों से नहीं डरा मैं-
    हूँ भयभीत मिलन के पल से ,
    फिर भी कभी मिलन हो जाये -
    यही मनौती मांग रहा हूँ .

    आकर कई अजनबी मुझसे -
    रोज अकेले भी मिलते हैं ,
    सिर्फ तुम्ही से मिलकर अपने -
    मन के अंदर झाँक रहा हूँ .

    दुनिया भर की गुत्थी मैंने -
    सुलझाई है , लेकिन तुमने ,
    खडी पहेली ऐसी करदी -
    जिसके हल को भाग रहा हूँ .

    नोंच परों को छोड़ गईं तुम -
    स्वप्न लोक मैं "राज " अकेला ,
    महामिलन की उम्मीदों के -
    पुल सपनों मैं बाँध रहा हूँ

    उत्तर देंहटाएं