शनिवार, 30 अप्रैल 2011


नामों में माँ का श्रेष्ठ नाम, स्थान सभी से उंचा है /
माता का धरती पर अब भी,सम्मान सभी से ऊँचा है /

धरती पर आते सर्वप्रथम, हमको जो गले लगाता है,
दुःख-दर्द सभी को भूल प्रथम,चुम्बन करने लग जाता है,
कांटा चुभ जाये हमें कहीं, हम से ज्यादा हो कष्ट उसे,
माँ एक शब्द में सिमट प्रेम,हर जगह अभय दे जाता है /

यह नाम है जो हर संकट में,आता है सबसे पूर्व याद,
संकट हारी,  कल्याण परक , यह ध्यान सभी से ऊँचा है /
माता का धरती पर अब भी,सम्मान सभी से ऊँचा है /  

सुंदर-कुरूप,गंदा जैसा,हर बच्चा उस को प्यारा है,
अपने से ज्यादा समझ उसे,संकट से सदा उबारा है /
प्राणों पर संकट देखा तो, लड़ गयी शेर से बिना शस्त्र ,
रक्षा करने को बच्चों की, मृत्यु को भी ललकारा है /

ईश्वर ने दुनिया में सोंपे, सदनाम भले ही कितने हों,
पर माँ रूपी जो नाम दिया, वरदान सभी से ऊँचा है /  
माता का धरती पर अब भी,सम्मान सभी से ऊँचा है




शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011


क्या मेल प्रिया

मैं दुबला -पतला मुन्ना सा, तुम मोटी धरा धकेल प्रिया ,
मैं स्कूटी तुम ऍन-फील्ड ,हम दोनों का क्या मेल प्रिया ,
मैं हूँ स्टेपनी नैनो की,तुम सुगढ़ सफारी का पहिया,
मैं चुहिया सा तुम लगो पाव, कैसे होगा ये खेल प्रिया /

मैं हिंद साईकिल टूटा सा, तुम नई बुलट हो परम प्रिया,
मैं हिन्दू सा निरपेक्ष जीव, तुम तालिबान का धरम प्रिया,
मैं पहलवान सिंगल पसली, तुम खली नन्दिनी लगती हो,
मैं हूँ मुकेश का नील रतन , तुम शेरावत बेरहम प्रिया /

तुम शाही पलंग सरीखी हो, मैं चर-मर करता तख्त प्रिया,
तुम भाग्य-वान  बंग्लेवाली , मैं झुग्गी का कमबख्त प्रिया ,
नीचे कालीनों के तुमने, अपने चरणों को धरा नहीं ,
तुम डनलप जैसी नर्म-नर्म ,मैं हूँ चटाई सा सख्त प्रिया /

तुम दिल्ली के मेट्रो जैसी, मैं पैसेंजर पटियाला का ,
तुम ख्म्बानी की डाटर सी, मैं नौकर लंगड़े लाला का,
धरती पर जब पग धरती हो, भूकम्प सरीखी हिलती है, 
तुम टुनटुन, मनोरमा जैसी, मैं मच्छर हूँ पशुशाला का /

तुम ब्रेड मोडर्न सूक्ष्म पकी, मैं जले हुए स्लाइस जैसा,
तुम दाल मक्खनी फुल थाली,मैं क्वाटरभर राईस जैसा,
मशरूम प्रिया तुम हाई-ब्रीड, मैं एक सड़ा सा आलू हूँ,
तुम प्राइस जैसी रोज बढ़ो, मैं रोज घटा साइज जैसा /

है लुकिग तुम्हारी जीएम सी, मैं लगता चपरकनाती हूँ,
स्पीड पोस्ट सी एक्टिव तुम, मैं पोस्ट कार्ड सी पाती हूँ ,
तुम हरियायाना सी हरी भरी, मैं राजपूताने का मरुथल,
तुम हो दिल्ली की हॉट मिक्स ,मैं पैचवर्क बरसाती हूँ /

मैं बरसाती खुट्टल चाकू ,तुम चमचम करती आरी हो,
मैं पड़ा उपेक्षित कोने में,तुम सबकी बहुत दुलारी हो ,
मुझ से केला तक कटे नहीं, तुम चोप करो सारी सब्जी,
तुम मल्टी-परपज छुरी लगो, फारेन की बनी दुधारी हो /

तुम ट्रक लगती हो टाटा का, मैं हूँ नैनो का मिनी रूप ,
मैं हूँ अशोक की लाट प्रिय, तुम शेरशाह का अंधकूप ,
तुम ताज महल सी लगो प्रिय, मकबरा लगूँ मैं उजड़ा सा,
अकबर जैसी तुम तनी-तनी , मैं हेमू पकड़ा हुआ भूप /

क्या जोड़ तुम्हारा मेरा है, हम नहीं एक हो सकते हैं ,
यदि साथ चलें तो हम दोनों, हथिनी चूहा से लगते हैं ,
तुम पूर्ण पूर्णिमा सी गोरी, मैं अमावसी अँधियारा सा,
हर एक गणित से जोड़-घटा,हम हास्यास्पद से लगते हैं /
हम हास्यास्पद से लगते हैं /

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

दर्द-ऐ-जनता जब कभी उनको सुनाने लग गये,
एक जरूरी कम से जाना,बताने लग गये /
फिर कहा, कोई यहाँ ,सुनता नहीं है दास्ताँ,
सिर्फ अपनी ही कहो , जग की सुनाने लग गये /
आप नेता हैं सभी के , जब कहा तो बोर हो,
दीन-दुनिया की हमें पट्टी पढ़ाने लग गये /
कल तलक जो कौम के बनते रहे थे रहनुमा,
हर जगह अपने चने बढकर बुनने लग गये /
बेहयाई ओढ़ कर, अब बन गये हैं वो दिलेर,
रिश्वतों के रेट खुद, सबको बताने लग गये /
पांच सालों से नहीं आये थे अपने क्षेत्र में,
हो गया घोषित इलेक्शन, रोज आने लग गये /
अध्यक्षता जब से मिली, एंटी-करप्शन बोर्ड की,
बे -झिझक हर डील में, हिस्सा बंटाने लग गये /
कल तलक रोटी न थी ,भरपेट इनके भाग्य में, 
एकड़ों में 'माल' दिल्ली में बनाने लग गये /
बेबसी है 'राज' अपनी ,है नहीं बस का निजाम ,
हो नहीं जब कुछ सका हम, सिर खुजाने लग गये /

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

शायर नहीं हूँ रख रहा हूँ आम बात को,
पर जो कहूँगा सबसे मेरी बार अलग है /
यूँ तो नहीं शोख मेरा अंदाजे-बयाँ पर,
दिल में  मैं उतर जाऊंगा, ये बात अलग है 


खुश्क-दर-खुश्क सी,उनकी कहानी गुजरी,
एक पल को भी नहीं ,हाय सुहानी गुजरी /
दोजख की सजाओं सा,बुढापा आया ,
दुआएं मांगने में उन की जवानी गुजरी /
सूर्य किरन का नित्य सवेरे आना,अच्छा लगता है ,
हरी धरा पर सरसों बिछ जाना ,अच्छा लगता है /

रोज भोर में मन्दिर जाती माँ, और भरी दुपहरी,
शाळा से बच्चों का घर आना , अच्छा लगता है /

अर्ध रात्रि में दबे पांव ,जग-भर से छुप - कर ,
दग्ध हृदय ले मुझ तक आना,अच्छा लगता है /

भले देर से आती हो तुम,महामिलन को प्रियतम ,
पर आते ही मुझ पर छा जाना, अच्छा लगता है /

नित्य भोर में मुझे पाश में, ले सो जाना पलभर को भी,
कंचन काया से बंध कर सो जाना,अच्छा लगता है /

मिलन घड़ी के पल-पल का दोहन करतीं तुम,
स्वयम रूठ कर मुझे मनाना,अच्छा लगता है /

सोते-सोते मीठी निंदिया में , जब मुस्काती तुम,
बिना बात यूँ ही मुस्काना , अच्छा लगता है /

नहीं चाहिए उम्र बहुत लम्बी सजनी बिन तेरे,
भंवरे सा तेरे संग जल जाना, अच्छा लगता है /

'राज' जान पर बन आती,जब जाती हो तुम,
अच्छा जाती हूँ कहकर ना जाना,अच्छा लगता है /

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

रोज सवेरे उठो बालको,थोड़ी कसरत करो बालको ,
छुओ पैर बड़े जितने हों, तभी काम कुछ करो बालको /
दांतों पर मंजन कर डालो, मुख को अच्छे से धो डालो,
अंग-अंग की मालिश करके, तब स्नान करो बालको /

थोडा ध्यान इष्ट का लाओ, और नाश्ता जी भर खाओ,
फिर बैठो पढने को भैया,पूरा ध्यान पाठ पर लाओ /
कल का पाठ पूर्ण दोहराकर, देखो पाठ आज का भी,
फिर शाला की करो तैयारी, बैग सही से स्वंम लगाओ /

पूरी ड्रेस पहन कर भैया, जूता पहनो,  टाई लगाओ ,
बैग टांग कंधे पर अपना, बस की लाइन में लग जाओ /
जा विद्यालय ध्यान लगा कर,करो पढ़ाई ध्यान लगाकर ,
इंटरवल में लंच उड़ाकर,पुन: पढ़ाई में लग जाओ /

हो छुट्टी न  दौड़ लगाओ, एक लाइन में बस तक जाओ ,
 घर आये आराम से उतरो,दोनों ओर देख घर जाओ /
बैग उतारो घर पर जाकर,रखो पुस्तकें सही जगह पर, 
होम वर्क जो आज मिला है, उसको सबसे ऊपर लाओ /

करो नाश्ता माँ जो देती, हो कर फ्रेश  खेल  को जाओ ,
जी भर खेलो मन से भैया, धमा चोकड़ी नहीं मचाओ /
घंटा भर तुम खेलो जमकर,लेकिन खेलो केवल दमभर,
खेल खत्म वापस घर आओ, होमवर्क सारा ले आओ /

बैठो जमकर करो ध्यान से, पूरा होमवर्क निबटाओ ,
कल के लिए ध्यान से अपना, पूरा-पूरा बैग लगाओ /
खाना खाकर जाओ शयन को, लेटो पाठ पुन: दोहराकर,
 राज' ध्यान इष्ट का करके,करो बंद आँखे सो जाओ /

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

पति जागरण गीत 

तीन दिन से हिचकियाँ ले क्यों रहा है तिलमिला ,

मातमी सूरत हटाकर, खत्मकर ये सिलसिला /
चार दिन की जिन्दगी है , काटता क्यों इस तरह ,
मेमना मत बन जरा सा शेर भी बन कर दिखा /

भीम का कुलदीप है तू ,रत्न दारा वंश का ,
हरकुलिस सा तन सधा है ,रक्त जिसमे कंस का /
खा रहा है तू खली के, जब बराबर मॉल तब ,
फिर भला पत्नी से तुझको डर लगे किस बात का/

देख कर बीबी की सूरत कांपता रहता है क्यों,
मूड कब हो ठीक उनका भांपता रहता है क्यों /
जब निकल जाती है शापिग, पर्स तेरा छीनकर ,
आँख उल्लू सी बड़ी कर, टापता रहता है क्यों /

माह का पहला दिवस है, आज तो कुछ ताव खा,
शेर से बकरी बनी ,बीबी को ऊँगली पर नचा /
तीस दिन के बाद आएगा, ये शुभ दिन लौट कर,
आज तो वेतन दिवस है, आज रंगदारी दिखा /

आज के दिन देवता सी, हो रही है वन्दना,
शेष दिन तो काटना हैं , तुझको उल्लू सा बना/
रात को बच्चे सुला कर,जब भी आये लक्ष्मी,
जागता हो फिर भी सोने का उसे नाटक दिखा /

उनतीस दिन सौभाग्य यूँ, नेपथ्य में रहता तेरा,
तीसवें दिन भाग्य से आता है सिंगल दिन तेरा /
जेब पर पड़ जाय डाका, उससे पहले बेवकूफ ,
चंद घड़ियाँ ही सही, स्वर्णिम उन्हें लेना बना /

सामने बीबी के कल से तू खड़ा मिम्याएगा ,
बस किराये के लिए तू, हाथ नित फैलायगा /
नोकरों से दिन कटेंगे , सब्जियां लायेगा तू ,
लेट हो जाये तो खाना, खुद लगा कर खायेगा /

तीस दिन बिस्तर तेरा खाली रहेगा जान जा ,
चाय, खाना,बस किराया,ही मिले पहचान जा /
इस लिए रिश्वत से अपनी जेब को मजबूत कर,
रोज पत्नी जेब चैकिग के लिए आती रहेगी जानजा /

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

आयुष्मती पूनम-आयुष्मान सर्वेश जी की रजत जयंती वर्ष-गांठ पर
 राज परिवार, खटीमा की ओर से सप्रेम 

आज ही तो मिले थे हृदय दो अलग ,
एक होकर बने एक संसार से  /
हो समर्पित गये , दूरियां न रहीं ,
एक मधुर धुन बजी मन के  स्वर तार से / 


बन गये ईश सर्वेश परिवार के ,
एक नया युग शुरू हो गया प्यार से /
दोनों मिल कर रहे सैकड़ों दुःख सहे,
स्नेह फूलों से था , नेह था खार से /

कितने तूफ़ान आये रहे पर अचल ,
एक से दो हुए हो गये चार से /
बेटियों को समझ मन से बेटा सदा ,
हर तरह पालते हैं इन्हें प्यार से /

बीत कैसे गया , एक युग ढल गया ,
वर्ष पच्चीस बीते , सतत प्यार से /
प्रेम छाया बना , एक छत की तरह , 
जो बचाता रहा , वक्त की मार से /

सात  सुर की तरह गीत -संगीत से ,
प्यार की मूर्ति पर चढ़े हार से /
ज्वार भाटा  जो आया ख़ुशी से सहा ,
 बच के चलते रहे वक्त की धार से /


दूज के चाँद सी खिलखिलाती थी जो ,
गोद में ही पली थी जो नित प्यार से /
आज पूनम वही , चन्द्रमा पूर्ण हो ,
सबके मन में बसी , पूर्ण अधिकार से /

आज पच्चिस बरस की बहारों के दिन ,
आये सर्वेश -पूनम के सत्कार से /
सौ बरस तक जियें, 'राज' जगमग करें ,
ये सुमी ओर विदु के सतत प्यार से /


सोमवार, 18 अप्रैल 2011

प्रिय पूनम के विवाह की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर राज परिवार की ओर  से सस्नेह 

रविवार, 17 अप्रैल 2011

जब लजा कर लगीं तुम हृदय से प्रिय -
देखने को हजारों सपन मिल गए /
बुझ गयी प्यास कितने जनम की मेरी -
जब हमारे -तुम्हारे नयन मिल गये /

कल्पना को मिली एक नव ज्योति अब -
हमको उनके हृदय में जगह क्या मिली 

यह धरा अब हमें स्वर्ग लगने लगी -
कल्पना लोक को शत नयन मिल गये /

तन के भूगोल में खो गए इस तरह -
घाटियाँ  और शिखर आ फिसलते रहे,

देखने हम लगे फिर से दिन में सपन,
मुक्त विचरण को कितने चमन मिल गये /

मौन रह कर भी करते रहे बात हम -
अंक से अंक का मौन भाषण हुआ ,

नैन से नैन जुड़ कर जडित हो गये -
अंग से अंग करके मनन मिल गए/  

न रहा याद कुछ, भूल सब कुछ गए -
सिर्फ मै रह गया ,और तुम रह गये,

वर्जनाएं सभी ढह गयीं "राज " फिर -
धुल में जग के सारे कथन मिल गये /


गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

आभास है !

भूख ,भय,भावुक -भयानक भेद का सहवास है  /
शब्दश : सम्यक ,सतत -सहमा हुआ परिहास है /

और भी गजलें उजागर कर रही हैं मुद दआ ,
किन्तु मेरी हर गजल , मजबूर का अहसास है /

चल पड़ा हूँ बस अकेला , भेदने  यह चक्र व्यूह ,
डर नहीं मन में ज़रा , या कष्ट का संत्रास है /

में अँधेरी कोठरी में , ढूंढता हूँ एक किरण,
रौशनी की बात करना, ही जहाँ बकवास है /

हैं अँधेरी रात , जुगनू तक कोई दिखता नहीं,
किन्तु मन में सूर्य सा, हरदम भरा उल्लास है/

'राज' गज़लें आयेंगी, आती रहीं हर दौर में,
मेरी ग़ज़लों में मगर, हर दौर का आभास है /


बुधवार, 13 अप्रैल 2011

माहौल गन्दा या खुदा

 इस सियासत ने किया, माहौल गंदा या खुदा ,/
फिर किया इन्साफ की देवी को अंधा या खुदा /

हानि-लाभों की तराजू में हमेशा तौल कर,
कर रहे संसद में जाकर , लोग  धंधा या खुदा /


 क्या गजब हित साधने ,क़ानून बनते हैं यहाँ ,
है यहाँ कानून  अब , बन्दा -ओ -बन्दा या खुदा 

कल तलक कानून का ,देता हवाला जो फिरा ,
 कत्ल वो कानून का ,करता दरिंदा या खुदा /

एक सा कानून भारत में नहीं लागू हुआ , 
तीन सौ सत्तर का सर पर , है पुलंदा या खुदा /

जिन्दगी भर जो लड़ा,जिन्दा हूँ मैं मुर्दा नहीं ,
घोषणा मरने पे होती ,है वो जिन्दा या खुदा /

घर में खाने को नहीं , लोगों के दाना अन्न का ,
लोग जबरन मांगते हैं , उससे चंदा या खुदा /

देश को किस घाट पर , जाकर डुबाएं 'राज 'ये ,
हर जगह बहती यहाँ , रिश्वत की गंगा या खुदा /

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

sahitsahchar

आँख न झपकी पल भर कल भी
आजभी अब तक जाग रहा हूँ .
कल से भूल भुलैया में ही
राह भटक कर भाग रहा हूँ .

है मुझको विश्वाश गईं तो
शायद कभी न आ पाओगी
पागल मन के वश में फिर भी
खड़ा द्वार पर ताक रहा हूँ .

तूफानों से नहीं डरा मैं-
हूँ भयभीत मिलन के पल से ,
फिर भी कभी मिलन हो जाये -
यही मनौती मांग रहा हूँ .

आकर कई अजनबी मुझसे -
रोज अकेले भी मिलते हैं ,
सिर्फ तुम्ही से मिलकर अपने -
मन के अंदर झाँक रहा हूँ .

दुनिया भर की गुत्थी मैंने -
सुलझाई है , लेकिन तुमने ,
खडी पहेली ऐसी करदी -
जिसके हल को भाग रहा हूँ .

नोंच परों को छोड़ गईं तुम -
स्वप्न लोक मैं "राज " अकेला ,
महामिलन की उम्मीदों के -
पुल सपनों मैं बाँध रहा हूँ

ममता राज


ममता राज