शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

कैसे सुलझे ये कठिन पहेली



          कैसे सुलझे ये कठिन पहेली
                             -डा.राज सक्सेना
       जब से मैंने अण्डमान यात्रा की है,एक यक्ष-प्रश्न मेरे सम्मुख सदैव
नाचता रहा है | काव्य-शास्त्र में रुचि रख्नने वाला हरएक साहित्यप्रेमी काव्य
की गहराई तक घुसकर छंद,शेर,मुक्तक,गीत या कविता में गहराई तक जाकर
निहितार्थ समझता है या फिर समझने का प्रयास करता है तभी उसे उसमें -
आनन्द आता है या फिर  यूं कहें कि कविता की सम्पूर्णता या उसके किसी
अंश का व्याख्या की कसौटी पर खरा उतरना ही उसके रस या आनन्द   की
सीमायें निर्धारित करता है | किन्तु कभी-कभी अपवाद स्वरूप गलत उदा-
हरण और मानक की ,वस्तुस्थिति से अनभिज्ञता या जानबूझ कर ध्यान न -
देने की प्रवृति अथवा गहनता पर बल न देने से कोई काव्यांश सम्पूर्ण काव्य-
कसौटी पर बिना परखे ख्याति के चरम छूकर अमर हो जाता है | ऐसे ही -
एक सुविख्यात उर्दू(अब तो हिन्दी का भी)शेर ने मेरा ध्यान आकर्षित किया |
मेरी कसौटी पर शेर आलंकारिक उदाहरण पर कहीं नहीं ठहरता | मैं  कोई -
विद्वान समीक्षक या भाषा विशेषज्ञ नहीं हूं किन्तु कलमकार होने के कारण
मुझे एक शेर में कुछ कमी अखरी है जो मैं विद्वानों की अदालत में रख रहा
हूं कि इस पर विस्तृत चर्चा हो और अगर कोई भ्रम की  स्थिति है तो उसका
समापन हो सके या संज्ञान लिया जा सके | आइये आते हैं उस शेर पर-
        हममें से शायद हर एक व्यक्ति ने किसी चौराहे,सड़क या मैदान -
पर किसी मजमे वाले से यह शेर जरूर सुना होगा-
        'शोर-ए-दरिया से ये कहता है,समन्दर का सुकूत  ,
        जिसमें जितना जर्फ है,उतना ही वो खामोश है |'
              इस शेर में मुझे तीन चीजें सही नहीं लगीं- शोर-ए-दरिया और
समन्दर का सुकूत(सुकून) प्रथम पंक्ति में तथा द्वितीय पंक्ति मे जितना
जर्फ है,वो खामोश है |
                       ऊपर मैंने अपनी अण्डमान यात्रा का संदर्भ दिया है | अब
मैं उसी सन्दर्भ पर आता हूं | वह एक राजकीय यात्रा थी जो समुद्र को
नजदीक से देखने तथा समुद्री यात्रा का पूर्ण आनन्द लेने के लिये जहाज
से की गई थी | इस यात्रा में समुद्र में आने-जाने की यात्रा में एक -
सप्ताह समुद्र के मध्य रह कर उसे पूरी तरह समझने का मौका मिला |
एक नया अनुभव था | जो इस शेर की व्याख्या की पृष्ठ भूमि बना |
                  अब से कोई दो माह पहले समुद्र-यात्रा के संस्मरण लिखते
हुए समुद्र की पृकृति को दोहराने पर इस शेर की खामियों पर नजर गई
उपरांकित खामियां महसूस हुईं | आइये संदर्भ लें -      
                    सबसे पहले 'शोर-ए-दरिया से प्रारम्भ करें | आपने
 बड़े-बड़े दरिया (नदियां)देखे होंगे | कितनी भी बड़ी नदी हो उसमें कितनी -
लहरें उठती हों अगर वह पर्वतीय क्षेत्र मे नहीं बह रही है तो उसमे लग-
भग न के बराबर शोर होता है | अपवाद हो सकता है जो मेरी जानकारी
में नहीं है |
          अब बात करें 'समन्दर में सुकूत(सुकून)' की | मैंने गोवा छोड़कर
पूरे देश के समुद्रतट देखे हैं | मुझे कहीं भी भारतीय समुद्रतट शांत नजर
नहीं आया | न द्वारिका में,न रामेश्वरम में,न दमण में,न चेन्नैई में और
न हावड़ा में | बेहद शोर लहरों के सर पटकने से होता है जिसे शांति या
सुकून तो हरगिज नहीं कहा जा सकता | यहां भी वही कहना चाहूंगा अप-
वाद हो सकता है जो मेरी जानकारी में नहीं है |
                समुद्र को नजदीक से देखने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि
समुद्र कितना अशांत,बेचैन और उन्मत्त होता है | उसकी तुलना किसी
भी दशा में किसी भी शांत वस्तु(दरिया) नदी से करना उचित या न्या-
योचित प्रतीत नहीं होती है |समुद्र के मुकाबले नदी हजार गुना शान्त -
होती है | मान लिया कि काव्य में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग -
कविता का सौन्दर्य द्विगुणित करता है किन्तु यह इस शेर की विडम्बना
है कि इसमे धुर विरोधी उदाहरण का प्रयोग किया गया है जो काव्यशास्त्र
की परम्पराओं के सर्वथा प्रतिकूल है |
       इस परिप्रेक्ष्य में इस के प्रतिवाद में मैने एक शेर अर्ज किया
है| अवलोकनार्थ प्रस्तुत है-
       'कौन कहता है समन्दर में सुकूत-ओ-चैन है,
       देखिये नजदीक जाकर हद तलक बेचैन है |'
क्या यह शेर इस प्रचलित शेर का सटीक प्रतिवाद करने में सक्षम है?यह
विद्वानों के परीक्षण का बिषय है |
                     अब आ इये शेर की दूसरी पंक्ति की ओर चलते हैं | समुद्र
को जर्फ ( जिसका शाब्दिक अर्थ बर्तन,सहनशीलता या समा लेने की -
शक्ति होता है ) से जोड़्ते हुए शायर ने बडे व्यक्ति की समा लेने या
सहन कर लेने की शक्ति को बड़ा बताया है |
        यह भी हर देखने वाला जानता है कि समुद्र आकार में बड़ा
होने के कारण किसी भी दशा में नीरवता का प्रतीक नहीं हो सकता है |
वह तो स्वंय बदमस्ती की दशा तक उन्मत्त तथा विध्वंसक है |
         अपनी सीमा (जर्फ) में पैर तक रख लेने वाले जीव को उखेड़
देने तक के लिये उद्ध्त सागर कितना कर्णभेदी शोर करता है यह
हर भुक्त भोगी अनुभव कर चुका है | जहाज पर यात्रा करने वाले बहुत
अच्छी तरह से जानते हैं कि चलता या खड़ा जहाज या उसमें बैठे  या
खड़े जीव समुद्र की उन्मत्तता और शोर के कारण कितना प्रताड़ित होते
हैं | बिना कुछ पकड़े खड़ा होना या बिना चिल्ला कर बोले आवाज तक
नहीं सुनाई देती है | ऐसे बदमस्त को जर्फ के कारण खामोश घोषित
कर देना कहां का न्याय है | क्या यही काव्य शास्त्र की कसौटी है |
           आइये इस सन्दर्भ में मेरा एक शेर देखें-
           'कह दिया किसने समन्दर जर्फ से खामोश है ,
          देखिये साहिल पे जाकर,किस कदर मदहोश है |'
           यह शेर भी मैं समीक्षकों को समर्पित करता हूं कि वे इस
शेर का भी हर पहलू से परीक्षण करके इसकी कमियों  को  जनसाधा-
रण के सम्मुख रखें |
           इस परिप्रेक्ष्य में मैने तो अपना      दृष्टिकोण       सम्मानित
विद्वान समीक्षकों के सम्मुख रखने का दुःसाहस कर दिया है | देखिये
इस प्रकरण में वे क्या व्यवस्था देते हैं |
           और चलते-चलते इसी संदर्भ में जर्फ पर एक और शेर
मुलाहिजा फरमाएं-
           'अभी से आंख में आंसू,ये कैसा जर्फ है साकी,
          अभी तो दास्तान-ए-गम शुरू भी की नहीं हमने |'
           अभी तो यह इब्तिदा है | आगे का सफर अभी बाकी है |
                                                  -धनवर्षा, हनुमान मन्दिर
                              खटीमा-262308 (उ०ख०)
                             मो०-09410718777

सोमवार, 5 दिसंबर 2011


mere chand ashaar

दूर से देखें, तो लगता है समन्दर में सुकूं,
पास जाकर देखिए,वो किस कदर बेचैन है |
          -०-
कौन कहता है समन्दर में,सुकूं है, चैन है,
देखिए नजदीक जाकर,हद तलक बेचैन है |
          -०-
 कह दिया किसने समन्दर,ज़र्फ से खामोश है ,
देखिये साहिल से वो,मदमस्त है, मदहोश है |
          -o-                                                          
हों इरादे जब अटल तब राह को कया देखना,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे,रास्ते बन जाएंगे |      $
          -०-
पर्वतों से हौंसले  लेकर चलेंगे हम अगर,
रास्ता देगा समन्दर,आसमां बिछ जाएगा |
          -०-
किस तरह रक्खी गई है बात किस के सामने,
है मुफस्सिर तो जरुरी, है असर हर बात का |
          -0-
दोबाला शान हो जाती,असर कुछ बढ गया होता ,
कहा जो तैश में तुमने,अगर हंस कर कहा होता |
                                        -राज सक्सेना ,खटीमा-262308

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

अटल सम्मान है बेटी


              खुदा की शान है बेटी
                                   डा.राज सक्सेना

पराया कह दिया किसने,हमारी जान है बेटी |
हमारी आंख का मोती,हमारी आन  है बेटी |
लगा देते हैं इज्जत में,हजारों  दाग बेटे पर,
ये इज्जत का खजाना है,बड़ी धनवान है बेटी |
सहा सब सर झुकाये ही,कभी भी उफ नहीं बोली,
बढाती है जो इज्जत को,वही सन्तान है बेटी |
जरुरत है हरएक घर की,बिना इसके अधूरा सब,
ये लक्ष्मी है,ये मीरा है, अजीमुश्शान है बेटी |
कभी मां है,कभी बीबी,कभी कुछ भी नहीं फिर भी,
हमारी हर बुलन्दी की, सही पहचान है बेटी |
ये मेहमां एक घर की है,तो रौनक दूसरे घर की,
उजाला दो घरों का है,कई सम्मान  है बेटी  |
अधूरा हर बशर, इसके बिना पूरा नहीं होता,
कहानी है बशर की तो,सही उनवान है बेटी |
दुआ है ये बुजुर्गों की,अता की है खुदा ने ये,
है नूर-ए-चश्म हम सबकी,घरों की शान है बेटी |

            -धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-262308(उ०ख०)
                                         मो- 09410718777






       अटल सम्मान  है बेटी
                                   डा.राज सक्सेना
हमारी आंख का मोती, सुफल- श्रुतिमान है बेटी |
पराया कह दिया किसने, सकल प्रतिप्रान है बेटी |
लगा देते हैं इज्जत में   ,हजारों  दाग बेटे, पर,-
ये इज्जत का खजाना है,धवल प्रतिमान है बेटी |
सहा सब सर झुकाये ही,कभी भी उफ नहीं बोली,
हमारे पूर्व जन्मों का,  नवल प्रतिदान है बेटी |
जरुरत है हरएक घर की,बिना इसके अधूरा सब,
ये लक्ष्मी है,ये मीरा है,  विरल रसखान है बेटी |
कभी मां है,कभी बीबी,कभी कुछ भी नहीं फिर भी,
हमारी हर बुलन्दी की, सबल पहचान है बेटी |
ये मेहमां एक घर की है,तो रौनक दूसरे घर की,
उजाला दो घरों का है, अटल सम्मान  है बेटी |
अधूरा  हर कोई, इसके बिना पूरा नहीं जग में,
कहानी हो किसी की भी,असल उनवान है बेटी |
दुआ  है  ये  बुजुर्गों  की,  प्रभु ने  भेंट  में  दी ये,
है नूर-ए-चश्म हम सबकी,खुदा की शान है बेटी |

            -धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-262308(उ०ख०)
                                         मो- 09410718777

     



    अटल सम्मान  है बेटी
                                   डा.राज सक्सेना
हमारी आंख का मोती, सुफल- श्रुतिमान है बेटी |
पराया कह दिया किसने, सकल प्रतिप्रान है बेटी |
लगा देते हैं इज्जत में   ,हजारों  दाग बेटे, पर,-
ये इज्जत का खजाना है,धवल प्रतिमान है बेटी |
सहा सब सर झुकाये ही,कभी भी उफ नहीं बोली,
हमारे पूर्व जन्मों का,  नवल प्रतिदान है बेटी |
जरुरत है हरएक घर की,बिना इसके अधूरा सब,
ये लक्ष्मी है,ये मीरा है,  विरल रसखान है बेटी |
कभी मां है,कभी बीबी,कभी कुछ भी नहीं फिर भी,
हमारी हर बुलन्दी की, सरल  पहचान है बेटी |
ये मेहमां एक घर की है,तो रौनक दूसरे घर की,
उजाला दो घरों का है, अटल सम्मान  है बेटी |
अधूरा हर बशर, इसके बिना पूरा नहीं होता,
कहानी है बशर की ये,असल उनवान है बेटी |
दुआ है ये बुजुर्गों की,  प्रभु ने भेंट में दी है,
है नूर-ए-चश्म हम सबकी,खुदा की शान है बेटी |

            -धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-262308(उ०ख०)
                                         मो- 09410718777

     

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

खुदा की शान है बेटी


          खुदा की शान है बेटी
                                   डा.राज सक्सेना

पराया कह दिया किसने,हमारी जान है बेटी |
हमारी आंख का मोती,हमारी आन  है बेटी |
लगा देते हैं इज्जत में,हजारों  दाग बेटे पर,
ये इज्जत का खजाना है,बड़ी धनवान है बेटी |
सहा सब सर झुकाये ही,कभी भी उफ नहीं बोली,
बढाती है जो इज्जत को,वही सन्तान है बेटी |
जरुरत है हरएक घर की,बिना इसके अधूरा सब,
ये लक्ष्मी है,ये मीरा है, अजीमुश्शान है बेटी |
कभी मां है,कभी बीबी,कभी कुछ भी नहीं फिर भी,
हमारी हर बुलन्दी की, सही पहचान है बेटी |
ये मेहमां एक घर की है,तो रौनक दूसरे घर की,
उजाला दो घरों का है,कई सम्मान  है बेटी  |
अधूरा हर बशर, इसके बिना पूरा नहीं होता,
कहानी है बशर की तो,सही उनवान है बेटी |
दुआ है ये बुजुर्गों की,अता की है खुदा ने ये,
है नूर-ए-चश्म हम सबकी,घरों की शान है बेटी |

            -धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-262308(उ०ख०)
                                         मो- 09410718777



रविवार, 23 अक्तूबर 2011

         टीस मन की सनसनाई

छू गई पुर वा जरा सा,टीस   मन  की  सनसनाई |
आस मन में प्रिय मिलन की,सिर छुपाकर गुनगुनाई |
         बस चुकी हो तुम नयन में,
         प्रीत बनकर , नेह बनकर |
         ढेर सपने हैं   पलक  पर ,        
         चांदनी रातों में  सज कर |
प्यास अधरों पर मिलन की,फिर उभर कर आज आई |
छू गई पुर वा जरा सा,टीस   मन  की  सनसनाई |
         छा रहा उन्माद पल-पल,
         वेदना की टीस तज कर |
         चाहता है साथ प्रिय का,
         फिर समा जाना परस्पर |
भर चुका सुधियों से आंगन,प्यार की झालर लजाई |
छू गई पुर वा जरा सा,टीस   मन  की  सनसनाई |
         प्यार की सौगात लेकर,आ-
         भी जाओ, मत सताओ |
         भूल कर संसार को अब-
         पाश में  मेरे   समाओ |
है सभी संसार नश्व्वर,जो घड़ी बीती   न    आई |
छू गई पुर वा जरा सा,टीस   मन  की  सनसनाई |


मंगलवार, 27 सितंबर 2011

बुजुर्गों के लिये



 
रहें बैठे निठल्ले  भी समय  तो  बीत जायेगा |
मगर जीने की इच्छा का घड़ा सब रीत जायेगा |
मैं बूढा हूं नहीं कुछ हो नही सकता न सोचें ये,
करें कुछ काम जनहित का,बड़ा आनन्द आयेगा |
          -०-
हजारों काम हैं  ऐसे जिन्हें  हम  खुद बना लेंगे |
किसी की जिन्दगी में हम खुशी के पल बढा देंगे |
उठो उठ कर संवारो जिन्दगी के पल जवानों से,-
उन्हें यह गर्व करने दो,कि हम दुनिया सजा देंगे |
          -०-
बिखर जाएं तो पल भर में,मिटा लें अपनी हस्ती को |
संवारें कुछ दिनों में तो, संवारें   एक     बस्ती को |
हमारे पास क्या कम है, झिझकते हम रहें क्युंकर,-
रहे हैं मस्त जब अब तक, जियेंगे  मौज-मस्ती  को |
          -०-
जब आए तो ऊसर था,बसाया है बहारों को |
पसीने से इसे सींचा, तो लाए सुखकी धारों को |
नहीं सोचा अगर होता,नई नस्लों के बारे में,-
तो कैसे झेल पाते हम,विकट तूफां हजारों को |
          -०-
यहां क्या था,हमारी नस्ल केवल जानती है |
हमारी शौर्य शक्ति को, ये धरती  मानती है |
यहां बाहों की ताकत से रहे हैं दोस्त हम जिन्दा,
हमारी बांह की ताकत, धरा पहचानती है |
          -०-
मिलेंगे फिर कभी तुमसे,दिलों मे आस रखते हैं |
करेंगे फिर कभी स्वागत,ये इच्छा खास रखते हैं |
खुशी से कर रहे हैं हम,विदा इन नौजवानों को,-
रहेंगे नौजवां सौ तक, यही विश्वास   करते  हैं |
           -०-
जो आया है उसे तो एक दिन जाना जरुरी है |
मगर हर रस्म दुनिया की, निभाना भी जरुरी है |
जिएंगे जब तलक,जिन्दादिली का पास रक्खेंगे,
भरम कुछ साथ में रख्नना,दिखाना भी जरूरी है |
            -०-

apna banalo

   प्रिय मुझे अपना बनालो
               -डा. राजसक्सेना
पाश में लो बांध मुझको,  एक  नया  संसार ढालो |
ना रहे अस्तित्व मेरा, अंक  में मुझ   को छुपालो |
   प्रिय मुझे अपना बनालो |

कल्पना से सिर्फ जब मन,है प्रफुल्लित तन मुदित है |
जब मिलन की कामना है, कामना में सब उचित  ह |
ढेर से स्वपनों को जीवन,- दान देकर   जगमगा लो,
   प्रिय मुझे अपना बनालो |

कुछ दिनों की बात है यह,फिर शमन हो जायगा सब  |
मिल रहा यौवन सतत तब,तन नया सुख पायेगा अब |
पल्लवित नवरूप लेकर,  रूप-यौवन को   सम्भालो ,
   प्रिय मुझे अपना बनालो |

देह  हों  दोनों  महालय, और  हम  दोनों   प्रवासी  |
प्यार हो बस प्यार उर में, हो नहीं  पल भर  उदासी  |
तुम मुझे दो प्यार अविरल,प्रतिदान  में अनुराग पालो ,
   प्रिय मुझे अपना बनालो |

aa...tan madmaata

   आगया बसन्त तन मदमाता
                    -डा.राजसक्सेना
बासन्ती चूनर लहराता,मद्धम स्वर में हर  क्षण गाता |
मदभरा मास आ गया पुनः,मकरन्दी मौसम छलकाता |
   आगया बसन्त तन मदमाता |

   हर लता चाहती लट सुलझे,
   प्रिय के कंपित निज कर से |
   घनघोर घटायें छा    जायें,
   हो पास प्रिय बिजली कड़के |
डर कर लिपटे वह प्रियतम से,लेकर अपना मन थर्राता |
मदभरा मास आ गया पुनः,मकरन्दी मौसम छलकाता |
   आगया बसन्त तन मदमाता |

   धरती पर लगे, लगी मेंहदी,
   दर्पण में दिखती छवि प्रिय की |
   मनचातक पियपिय बोल रहा,
   हर दिशा लगे महकी-महकी |
मनकरता तनको दुलराने,इसक्षण प्रियतम आंगन आता |
मदभरा मास आ गया पुनः,मकरन्दी मौसम छलकाता |
   आगया बसन्त तन मदमाता |

   आती  पुरवाई  गंध  लिये,
   स्वर्णिम किरनों को संग लिये |
   तन छूने लिपटे भावविव्हल,
   प्रिय सा अनुपम स्पर्श लिये |
प्रिय सा छूजाना अनजाने,हल्का तन-मन को कर जाता |
मदभरा मास आ गया पुनः,मकरन्दी मौसम छलकाता |
   आगया बसन्त तन मदमाता |

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

       चन्द रुबाइयां
चली आई बड़े तड़के,   मेरे घर  पर लिए डोली |
हमारे कान में'अब उठ'किरण कुछ् इस तरह बोली |
मिलन की रात बीती है,मिलन क्षण शेष हैं मन में,
अभी क्यों दे रही दस्तक,अभी आराम  कर भोली |
             -०-
तुम्हारी रेशमी आहट, मेरे  जब   पास आती है |
मिलन की कामनाओं का,मधुर अहसास लाती है |
मुझे अमराइयों के झुटपुटे क्षण याद  आते   हैं,
सितारों से भरा आंगन,मिलन की आस लाती है |
             -०-
तुम्हारी देह    का दर्पण , मेरा  श्रंगार  करता है |
छिपी मन में    अगर पीड़ा,त्वरित संहार करता है |
मिलन सौ    बार होता है,अगर तुमसे अकेले में,
मिलें कुछ और क्षण मुझको,हृदय हर बार करता है |
             -०-
मिलन की प्यास बुझ जाये, कहें ये देह के धागे |
यही  क्षण चक्षु ने चाहा,  यही मन गेह ने चाहे |
रहो सानिध्य में हरदम , यही है कामना प्रियतम,
तुम्हारे साथ क्यों बांधे,  ये हमने स्नेह के धागे |
             -०-
झिड़क सब कामनाओं को,तुम्हारी देह से बाहर निकलता हूं |
मलय  सा   हो गया हल्का, क्षितिज के पार चलता   हूं |
सृजन नव कर दिया हमने , नये संसार  का   प्रियतम ,
धरोहर प्यार की अर्पण ,  तुम्हें  हर  बार   करता   हूं  |
              -०- 

बुधवार, 14 सितंबर 2011

राष्ट्रभाषा


       राष्ट्रभाषा
            -डा.राजसक्सेना
मातृभाषा पर जिसे,अपनी न स्वाभिमान है |
राष्ट्रभाषा के प्रति, रखता नहीं अधिमान  है |
पूर्ण पशुवत है जिसे,ना शीर्ष पर हो राष्ट्रप्रेम,
सम्पदामय हो,अकिंचन का सही प्रतिमान है |
        -०-
उठो उठकर तलाशें  हम, नई  सम्भावनाओं को |
करें हिन्दी की अब सेवा,करें नव- साधनाओं को,
सरल जीवन,सघन मेहनत,यही चाहा है हिन्दी ने,
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें धारणाओं  को |
        -०-
हमारे दिल में हिन्दी का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से दिल की धड़कन में,दिलेबेताब  बाकी  है |
शहर से उठ गई हिन्दी,हमारे गांव में    लेकिन,
धड़कती है दिलों मे वो,सरो-शादाब    बाकी  है |
        -०-
मैं हिन्दी हूं,मै हिन्दी था,रहूंगा मैं सदा  हिन्दी |
है हिन्दी ही कथा मेरी,रही हमदम सदा  हिन्दी |
नहीं हूं वर्णसंकर मैं,जो बोलूंगा  अलग  भाषा,
मैं भारत मां का बेटा हूं,मैं बोलूंगा सदा हिन्दी  |
        -०-
करेगी देश को जगमग,मुझे विश्वास विश्वास हिन्दी का |
है उत्सव के लिये निशचित,सितम्बर मास हिन्दी का |
हर एक चौद्ह सितम्बर को,मनाते हैं हम 'हिन्दी डे'-
इसी दिन हम किया करते हैं,तर्पण खास हिन्दी  का |
        -०-
मनाते इस तरह से हम, अजब त्योहार हिन्दी   का |
इकट्ठे हो लिये, मातम मना, हर बार  हिन्दी  का |
बना कर एक खबर भेजी जहां छपता  है   रोजाना-,
फिर अगले दिन पढ़ा करते हैं हम,अखबार हिन्दी का |
        -०-
 

सोमवार, 12 सितंबर 2011


      ब्रजेन्द्र भगत तुमको प्रणाम
                     -डा.राज सक्सेना
मारीशस  जैसा  पुण्य-धाम,
उसमें जन्मा एक पुण्यनाम |
हे राष्ट्रकवि ब्रजेन्द्र  भगत-,
तुमको हिन्दी के शतप्रणाम |

अविराम लिखा इतना तुमने,
हिन्दी में महिमा भरने को |
पचहत्तर कविता लिख डालीं,
सुन्दरतम हिन्दी करने को |

हिन्दी,हिन्दू के  संरक्षक -,
तुमने  इतिहास बनाया है |
हिन्दी - गंगा की धारा को,
तुमने सम्भाष  बनाया है |

सेवा अविरल कर हिन्दी की,
तुम बने,सुशोभित राष्ट्रकवि |
अन्तरतम वीणा झंकृत कर,
दे दिया श्रेष्ट ,बन  महाकवि |

कल्पनालोक में विचरण्-कर ,
तुमने रच डाला सब यथार्थ |
हे राजहन्स कविता युग के ,
रथियों मे शोभित श्रेष्ठ पार्थ |

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

ईद-मुबारक


       ईद-मुबारक
             -डा.राज सक्सेना
ईद  पर  रस्म  है,मिलते  हैं  गले  सब बढ़कर |
चलो मिलकर गले,इस ईद पर हम दोस्त हो जाएं |
          -०-
वस्ल पर रोक लगा दी है,चलो मान गये |
ईद पर दीद न हो, रस्म भी तोड़ी तुमने |
          -०-
ईद पर उनसे कहा,आओ गले मिल जाओ |
दबा के होंठ ये बोले,मिंयां  मुंह धो आओ |
          -०-
जवानी में क़दम रखते ही,जगमग कर दिया आलम |
जवां भरपूर होकर तुम,ग़ज़ब ढ़ाओगे  क्या  जानम |
          -०-
नहीं है उम्र कम लेकिन,बहुत भोले हैं दिल के वो |
किये ज़िद कल से बैठे हैं,दिखाओ दर्दे दिल हमको |
          -०-

शनिवार, 27 अगस्त 2011

खुशनुमा ख्वाब


      खुशनुमा ख्वाब
              -डा.राज सक्सेना
खुशनुमा से ख्वाब पलकों पर सजा कर जायेगा |
ढ़ेर से गम चन्द खुशियों में मिला कर जायेगा |
एक लम्हा वस्ल का,जिसको संजोया आजतक,
ये धरोहर क्या मेरी,दुनिया जला कर  जायेगा |
इश्क क्या एक फलसफा है,जो उलझता ही गया,
अब तलक समझा नहीं,कोई बता कर जायेगा |
हसरतें बैठी हैं दिल में,ये समझती क्यों  नहीं,
एक दिन,ये दिलजिगर,सबकुछ दग़ा कर जायेगा |
प्यार का है ज़ख़्म ये,इसकी दवा कितनी भी हो,
याद से अपनी वो ज़ालिम,फिर हरा कर जायेगा |
'राज'लम्बी है जुदाई,डूबता   जाता  है  दिल,
इन्तज़ार-ए-वस्ल क्या,हमको मिटा कर जायेगा |

मधुमास की तरह

      मधुमास की तरह 
               -डा.राज सक्सेना 
हर पल बना है इन दिनों,मधुमास की तरह |
लगने लगे हैं वो मुझे , अब खास की तरह |
इतने हसीन थे वो  मुझे  ये  पता  न  था,
उतरे दिलो-दिमाग में , अहसास  की तरह |
आंखें चकोर बन के, उन्हें   ढ़ूंढ़्ती  हैं बस,
यूं बन रही है ये कथा,  इतिहास  की तरह |
दो पल को दूर कया हुए, लगने लगा  मुझे,
दो युग बिता के आये है,बनवास  की तरह |
उन से बिछड़ के किस तरह रह पाएगा ये दिल,
कांटा सा चुभ रहा है, इक संत्रास  की तरह |
रहने लगे हैं दूर्   हमसे'राज'  आज कल,
क्या हो रहा था खेल ये, परिहास की तरह |

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

अनुवादक


       अनुवादक
             -डा.राज सक्सेना
 अनुवाद-विधा उपवन में जब,
 अनुवादक विचरण करता  है |
 कुछ श्रेष्ठपुष्प वह चुन-चुन कर,
 जन-जन के सम्मुख रखता है |

 अनुवाद कला में     पारंगत ,
 जो लोग जगत  में  होते  हैं |
 वे मूल कथन के भिन्न भाव ,
 अक्षरशः  सभी   पिरोते   हैं |

 जो कहा गया  उससे हट कर ,
 कहना  आवश्यक  होता  है |
 बस तभी सफल अनुवादक भी,
 कुछ बहुत जरूरी   कहता है |

 कविता में कवि का मूल भाव,
 कविता में चांद   लगाता  है |
 पाठक भी भाव-विभोर   बने,
 जब मूल-भाव  पढ़ पाता  है |

 हो कथ्य कथा का भाव सहित,
 जब मूल कथा  के अनुकूलित |
 तब वह पाठक के दिल तक भी,
 जाकर    करता है   उद्वेलित |

 है मर्म  यही अनुवादन    का,
 विद्व्द्जन  यही   बताते   हैं |
 अनुपालन करते अनुवादक  जो,
 धन,कीर्ति,सुयश  पा  जाते हैं |

  अनुवाद - विधा
          -डा.राज सक्सेना
 अनुवाद विधा है,श्रेष्ठ - विधा ,
 साहित्य जगत की थाती   है |
 साहित्य इतर जो अन्यों  का,
 उससे परिचय  कर वाती  है |

       परिचय का माध्यम और साध्य,
       जन-जन का परिचय देती   है |
       यह समय और धन खर्च बिना,
       कण-कण सम्मुख रख देती  है |


 जो  कठिन  परिश्रम  से  पाया,
 अन्यों की तिल-तिल मेहनत से |
 कुछ क्षण मे यह अनुवाद-विधा ,
 जग भर में रखती अनुमति  से |

        श्रमशील साध अनुवादक   की,
        जो भाव सहित  अनुवाद  करे |
        यदि अन्तरतम से लिखा गया,
        सम-रूप वही  सम्वाद   करे |

 है कठिन मगर मन-रंजक   है,
 अनुवाद विधा  का    अपनाना |
 लेखक सा मन-मस्तक  लेकर,
 पाठक-श्रोता  तक    पहुंचाना |

         यह कठिन और श्रमसाध्य कर्म,
         जो विद्वत्जन    अपनाते   हैं |
         वे विश्व धरोहर     रचनाएं -,
         जन-गण-मन तक ले आते हैं |

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अश्क-ए-जिगर्-अशआर


    अश्क-ए-जिगर्-अशआर
                 -डा.राज सक्सेना
इन्तहा करदी जहां वालों ने,अपने प्यार की तुझ पर |
तभी तो ले गये तुझ को , उठा कर आस्मां  वाले |
               -०-
तुम क्या गये कि साथ सब,खुशियां चली गयीं |
तुम सो गये तो साथ हर,लज़्ज़त भी सो गयी |
               -०-
अभी से आंख में आंसू, ये कैसा ज़र्फ है साक़ी |
अभी तो दास्ताने ग़म, शुरू भी की नहीं हमने |
              -०-
बहारों में  हमें  भी याद कर लेना चमन वालो,
बहुत सींचा पसीने से,चमन हमने भी ये बरसों |
              -०-
तरतीब से ख्वाबों की, ये  ज़ीस्त  बनी है,
ये ख्वाब बिखर जाएं तो,फिर मौत भली है |
              -०-
कुछ लोग तो पल भर में,जीते हैं ज़ीस्त पूरी,
कुछ लोग सौ बरस में,पल भर भी नहीं जीते |
             -०-
क्या बात है चमन में, फीका  है  रंग सबका,
ग़ुलचीं को कुछ हुआ क्या,सिसके है गुंचा-गुंचा |
              -०-
हो शाख  से अलग तो,रोता है शजर बरसों,
जिस ग़ुल को बहारों में, नाज़ों से संवारा हो |
             -०-

सोमवार, 22 अगस्त 2011

मैं हिन्दी हूं


      मैं हिन्दी हूं
             -डा.राज सक्सेना

मैं हिन्दी हूं,मैं हिन्दी था,रहूंगा मैं सदा हिन्दी |
है हिन्दी ही कथा मेरी,रही हमदम सदा हिन्दी |
नहीं हूं वर्णसंकर मैं, जो बोलूंगा मैं  अंग्रेजी ,
मैं भारत मां का बेटा हूं,मैं बोलूगा सदा हिन्दी |
          -०-
करेगी देश  को  जगमग,मुझे   विश्वास हिन्दी का |
है उत्सव के लिये निश्चित,सितम्बर मास हिन्दी का |
हर एक चौदह सितम्बर को,मनाते हैं हम 'हिन्दी डे',
इसी दिन हम किया करते हैं,तर्पण खास हिन्दी का |
         -०-
मनाते इस तरह से हम, अजब त्योहार हिन्दी का |
इकट्ठे हो लिये, मातम  मना,हर बार हिन्दी का |
बना कर एक खबर भेजी,जहां छपता  है रोजाना ,
फिर अगले दिन पढ़ा करते हैं हम अख्बार हिन्दी का |
        -०-

गवइये सुर लगाते हैं


       गवइये सुर लगाते हैं
                   -डा.राज सक्सेना

गवइयों की सजी महफिल,गवइये सुर लगाते हैं |
कुछ अपने खूबसूरत मुख,अदाएं कर दिखाते  हैं |
हमारे पास क्या,सूखे शजर में फूल खिलते क्या ?,
लो हम भी आपके सम्मुख,मटककर हिनहिनाते हैं |
          -०-
कवि को धैर्य से सुनना, अजब है  बेबसी यारो |
यहां हमको बुलाया है, ये इनकी  बेबसी  यारो |
चलो इस हाथ खुशियां लें,तुम्हें देते हैं गम भारी,
सुनो इतने तो हमको भी,समझलो बेबसी  यारो |
          -०-

कुछ सख्त-सख्त


      कुछ सख्त-सख्त
              -डा.राज सक्सेना

तू श्वानों की तरह से भोंकता और वार करता है |
वतन को बेच खाने के नियम तैयार  करता  है |
विदेशी बैंक में जाकर तू रखता है कमाई   को,
लड़ा कर धर्म-जाति पर,वतन बरबाद करता  है |
          -०-
अरे शिशुपाल सा बरताब करना छोड़ दे अब तो |
बिदकना,भोंकना,बकवास करना छोड़ दे अब तो |
तुझे हम माफ कर देंगे,अगर सत्ता की खातिर तू,
वतन का बेचना,व्यापार करना छोड़ दे अब  तो |
         -०-
ये श्वानों सा रुदन तू झींक कर हर बार करता है |
हमारी राष्ट्र्-भक्ति पर,तू हरदम   वार करता  है |
अरे सत्ताके भंवरे सुन, न  आतंकी  हमें   कहना,
यहां का मूल हर ब्च्चा,वतन को प्यार करता है |
              -०-
उलझना मत कभी हमसे,अगर ली हमने अंगड़ाई |
वहीं पर ड़ाल देंगे हम ,  जहां बिकती है चतुराई |
हम आंधी हैं तेरी कीलों से हम रुक नहीं सकते ,
जो दृष्टि वक्र की हमने, न मिल पायेगी परछांई |
               -०-
बड़प्पन है हमारा ये,कि हम चुपचाप रहते  हैं  |
तू हमको गालियां देता है,हम सन्ताप सहते हैं  |
मगर सत्ता के लोलुप सुन,अति का अंत होता है,
सहेंगे अब नहीं कुछ भी, ये तुझसे साफ कह्ते है |

    धनवर्षा,हनुमानमन्दिर्,खटीमा-२६२३०८
          मो- ९४१०७१८७७७

शनिवार, 20 अगस्त 2011

संस्था-गीत माडर्नयूटोपियन्स


      संस्था-गीत माडर्नयूटोपियन्स
                      -डा.राज सक्सेना

अटल  इरादे  हिम्-पर्वत  के,शिखर -सरीखे ठान कर |
जन-गण के उत्थान लक्ष्य को,निकले मन में मान कर |

अविचल रह कर प्रेमभाव पर,नहीं बैर का नाम सुनेंगे ,
पड़ जाएं मन बीज फूट के, नहीं  सहेंगे-नष्ट  करेंगे  |
एकनिष्ठ हो कर्म समर्पण,  एक राय  सम्मान   कर्,
जन-गण के उत्थान लक्ष्य को,निकले मन में मान कर |

शिवा सरीखा करें नाम हम,भगत सिंह सा काम करेंगे ,
राणा जैसे कष्ट मिलें पर,  कर्तव्यों से  नहीं   हटेंगे |
करें निछावर प्राण देश पर,लक्ष्य हृदय  में  ठान कर |
जन-गण के उत्थान लक्ष्य को,निकले मन में मान कर |

लोककला सर्वोच्च बनाकर , ललितकलाओं को महकाएं,
प्राण फूंक साहित्य विधा में,साहित्यिक सहचर बनजाएं |
हिन्दी संग गढ़वाल-कुमैय्या, भाषा का उत्थान   कर ,
जन-गण के उत्थान लक्ष्य को,निकले मन में मान कर |

  धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८ (उ०ख०)
          मो०- ०९४१०७१८७७७

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

निभाता कौन है |


      निभाता कौन है |
            -डा.राज सक्सेना
कब किसी के भी दुखों में,काम आता कौन है |
दो कदम भी साथ दे, जहमत उठाता कौन है |
सर्द हैं चेहरे सभी के, संवेदनायें मिट चुकी हैं,
गीत खुशियों के कभी भी,गुनगुनाता कौन है |
कारोबारी हो गए,इंसानियत   मन से  गयी,
घर पड़ोसी के भी मय्यत,हो तो जाता कौन है |
दूर तक फैला हुआ है,शून्य सा एक आजकल,
एक बच्चे की तरह अब ,खिलखिलाता कौन है |
आज बच्चा भी तरसता,मां से मिलने के लिये,
लोरियां लाड़ों भरी,  उसको  सुनाता कौन है |
ताबूत में सब बन्द जैसे,आज कब्रिस्तान में,
रस्में दुनिया"राज्"है पर,ये निभाता कौन है |

 धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)
      मो- ०९४१०७१८७७७

शनिवार, 13 अगस्त 2011

चन्द कतात


      चन्द कतात
            -डा.राज सक्सेना
यूं तो कहने को वतन में,अब सवेरा हो गया |
नफरतों का हरतरफ, लेकिन अंधेरा हो गया |
देश के रक्षक का हमने,जिसको बख्शा था खिताब,
बदनसीबी"राज"अपनी,  वो लुटेरा हो गया |
       -०-
उन्नत ललाट पर चमक रही,भारत माता की बिन्दी है |
है ब्रह्मपुत्र सम हिमनद यह,सतलुज,सरयू,कालिन्दी है |
जो आकर मिला पवित्र हुआ,है पतित-पावनी मां जैसी,
वर्तनी सरल,भाषा सीधी,निर्मल गंगा सम हिन्दी है |
      -०-
अब नही आतंक से डर,शेष तक ना वेदना है |
चक्षु लाखों अब सजग हैं, वार तेरा देखना है |
देश में ही रह रहे,  विश्वासघाती  वार कर -,
जाग कर बैठा है हिन्दू,मुस्लिमों में चेतना है |
      -०-
निकले थे हम कहां के लिये आ गये कहां |
हर ओर लाश खून है,उजड़ा  है हर  मकां |
किसने लगादी आग फिर, अम्नोअमान को,
फिर दिख रहा है हर तरफ,उठता हुआ धुआं |
     -०-
रिश्तों के तार तोड़कर,बैठे हुये हैं कयों |
हम नफरतों के दौर,समेटे हुये हैं क्यों |
सांझी विरासतों का, इतिहास भूलकर ,
बारूद के एक ढेर पर बैठे हुये हैं क्यॉ |
     -०-
तन बिक गया बाजार में,थोड़े से धान् में |
बिखरी पड़ी है लाज एक्,सूने मकान  में |
सपना यही था क्या मेरे,आज़ादहिन्द का,
जन्ता का ये भविष्य है,भारत महान में |
     -०-

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011


     
       आनन देखा है
               -डा.राज सक्सेना
हे प्रियतम तुमने बसंत में,क्या अपना आनन देखा है |
सत्य कहो इस आनन जैसा,क्या मह्का मधुवन देखा है |
हूक उठीहै कभी हृदयमें,एक अजब सी प्यास जगी क्या,
इस बसंत की किसी रात में,निज मन का नर्तन देखा है |
रिमझिम वर्षा इन्द्र्धनुष से, एकनई अनुभूति जगाकर,
काजल सी घनघोर घटा में,सन्-सन् करता तन देखा है |
रस बरसाते पूर्ण चन्द्र ने, कभी नहीं क्या मधु बरसाया,
उस मधु से सिंचित परियों सा,क्या अपना यौवन देखा है |
आह् शिशिरके हिमपातोंने,असर नहीं क्या तुमपर डाला,
सर-सर चलती शीतपवन में,क्या जलता तनमन देखा है |
"राज"तृषित नयनोंसे अपलक,तुमको अविरल देख रहा है,
करुणकथा सा कुसुमित् उसका,क्षुधित हृदयक्रंदन देखा है |
      धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उख०)
         मोबा- ०९४१०७१८७७७

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

अपना यार करता है


       अपना यार करता है
                -डा.राज सक्सेना

नहीं करता जो  दुश्मन  भी,वो मेरा यार करता है |
झुका कर शोख नज़्ररों को,वो दिल पर वार करता है |
मुझे मालूम है ये सब,मगर ये बात दिल की है,
अजब शै है ये मेरा दिल, उसी से प्यार करता है |
हमेशा की तरह् वादा , न आएगा वो शबभर फिर,
जगा कर रात भर हमको, हमें  बेदार  करता है |
खता हमसे हुई कैसी,लगा बैठे हैं दिल उससे,
जो इज़हारे मुहब्बत से,सदा इन्कार करता है |
मैं जब-जब फूल चुनता हूं,चढ़ाने के लिये उसपर,
चुभोने को वो कांटों की,  फसल तैय्यार करता है |
ये कैसा प्यार है हरदम,मचलता है सताने को,
फसाने को मुहब्बत के, सदा मिस्मार करता है |
अकीदा किस कदर मुझको,मुहब्बत पर मेरे दिल की,
जो इतनी ठोकरें खाकर, यकीं हर बार करता है |
मुझे मालूम है यह भी,करूं क्या"राज"इस दिल का,
जो महरूम्-इ-वफा उससे,वफा दरकार करता है |
   धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)

आनन देखा है


       आनन देखा है
               -डा.राज सक्सेना
हे प्रियतम तुमने बसंत में,क्या अपना आनन देखा है |
सत्य कहो क्या इससे पहले,दह्का चन्दन्-वन देखा है |
हूक उठीहै कभी हृदयमें,एक अजब सी प्यास जगी क्या,
इस बसंत की किसी रात्रि में,मन करता नर्तन देखा है |
रिमझिम वर्षा इन्द्र्धनुष से, एकनई अनुभूति जगाकर,
काजल सी घनघोर घटा में,थर-थर करता तन देखा है |
रस बरसाता पूर्ण चन्द्रमा, कभी नहीं क्या तृषा जगाता,
स्वप्नों में क्या खुद का तुमने,परियों सा यौवन देखा है |
अरी!शिशिरके हिमपातोंने,असर नहीं क्या तुझपर डाला,
सर-सर चलती शीतपवन में,जलता सा तनमन देखा है |
क्यों चकोर सा"राज"ताकता,कब से सूनी आंख लिये,
दीप-शिखा सा जलता उसका,क्षुधित हृदयमंथन देखा है |
      धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उख०)

बुधवार, 10 अगस्त 2011


            डा.राज सकसेना

घिनौनी अब सियासत हो रही है |
गरीबों पर सलावत  हो  रही है |
हमें कातिल बता कर हर जगह पर,
यूं कातिल की हिफाज़त हो रही है |
थमा कर हाथ में दोनों के खंज़र ,
अजब सी यह सखावत हो रही है |
गैर को मां का आंचल ही थमाकर्,
दलाली में महारत हो रही है |
हिली थोड़ी चेयर तो चीखते हैं,
विपक्षी दल से शरारत हो रही है |
हमें ही मानते हैं कारण गरीबी ,
टैक्सचोरों पर इनायत हो रही  है |
हजामत हो रही है"राज्"जमकर ,
नहीं  फिर भी,बगावत हो रही है |
 धनवर्षा,हनुमान मन्दिर खटीमा-२६२३०८

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

कथा शहीद उधमसिंह्


    कथा शहीद उधमसिंह्  
              -डा.राज सक्सेना
इकत्तीस जुलाई प्रतिवर्ष,
हम को कुछ याद दिलाती है |
एक अमरकथा बलिदानी की,
आ नयनों में बस जाती है |

पंजाब प्रांत का सुनाम ग्राम,
हो गया धन्य कृत्कृत्य हुआ |
नारायणकौर सुमाता ने,
जब शेरसिंह को जन्म दिया |

था दिवस दिसम्बर का छब्विस,
निन्नानबे अट्ठारह सौ सन था |
पिता टहलसिहं उछल पड़े,
जब पुत्र जन्म संदेश सुना |

अल्पायु में माता खोकर,
परवरिश अनाथों में पाई |
जब अमृतपान छका उसने,
तब नाम उधम पाया भाई |

बचपन में जलियां बाग हुआ,
अंग्रेजों से नफरत मानी थी  |
डायर से बद्ला लेने की,
मन में उसने  निज ठानी थी  |

इंग्लैण्ड गये  और घात लगा,
ओ डायर का बध कर डाला |
एक कील ठोक कर शासन में,
साम्राज्य ब्रिटिश को मथ डाला |

चढ़ गये खुशी से फांसी पर,
जय भारत मां की बोली थी |
अपने ही बल से  सिंह्पुरूष,
राह्-ए-आजादी खोली थी |

"काम्बोज रत्न, हे उधमसिंह्",
तुम भारत के जन-नायक हो |
तुम सिंह्-प्रसूता भारत-मां के ,
हो गये अमर,वह शावक हो |
 धनवर्षा,हनुमानमन्दिर, खटीमा

रविवार, 7 अगस्त 2011

उन्नत,उज्ज्वल,उत्तराखण्ड

     उन्नत,उज्ज्वल,उत्तराखण्ड
                   -राज सक्सेना

भरत-भूमि,भव-भूति प्रखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

सकल-समन्वित,श्रमशुचिताम |
शीर्ष-सुशोभित,  श्रंग-शताम |
विरल-वनस्पति, विश्रुतवैभव,
पावन,पुण्य-प्रसून,  शिवाम |

हरित-हिमालय,हिमनदखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

नन्दा, नयना,  पंच-प्रयाग |
भक्ति-भरित,भव-भूमिप्रभाग |
अन्न-रत्न आपूरित   आंगन,
तरल-तराई,    तुष्ट्-तड़ाग |

तपोनिष्ठ ,तपभूमि , प्रचण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |


गिरिजाघर, श्रुत-श्रेष्ठ  विहार |
कलियर, हेमकुण्ड,  हरिद्वार |
परम-प्रतिष्ठित,चतुष्धाम-मय,
पावन-गंगा,   पुलक-प्रसार |

धीर, धवल-ध्वज,धराप्रखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |


शौर्य, सत्य, शुचिता-संवास |
सर्वधर्म,   समुदाय  समास |
पावन-प्रेम, परस्पर- पूरित,-
मूल सहित, श्रमशील प्रवास |

भ्रातृभाव, भवभक्ति  अखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८  

सूरज तुम क्यों रोज निकलते


       सूरज तुम क्यों रोज निकलते
                      डा.राज सक्सेना
सूरज तुम क्यों रोज निकलते,छुट्टी कभी नहीं क्यों जाते |
सातों दिन छुट्टी पर रह कर,नियमों की क्यों ह्सीं उड़ाते |
भोर हुई मां चिल्ला उठती ,उठ बेटा सूरज उग आया-,
आंखें खोलो झप्-झप जातीं,सिकुड़ सिमट अलसाती काया |
सिर्फ तुम्ही हो जिसके कारण,नींद नहीं पूरी हो पाती,
क्लास रूम में बैठे-बैठे , अनचाहे झपकी आ जाती |
सूरज तुम स्वामी हो सबके, नियमों का कुछ पालन करलो |
एक दिवस बस सोमवार को,छुट्टी तुम निर्धारित करलो |
नहीं उगे तो छुट्टी अपनी, सण्डे संग मण्डे की होगी,
जीभर सो ले दो दिन तक तो, फिक्र नहीं डण्डे की होगी |

संभव ना हो किसी तरह ये, इतना तो तुम कल से करना,
थोडा सो लें अधिक देर हम, कल से तुम नौ बजे निकलना |
   धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-२६२३०८ (उ०ख०)
    मोबा०- ०९४१०७१८७७७

bhasha computer ki


    भाषा कम्प्यूटर की
भाषा कम्प्यूटर की हिन्दी है,
यह स्वयं  सिद्ध हो जाता है|
हिन्दी प्रयोग से संचालन -,
जब स्वंय सरल हो जाता है|

य़ूं तो भाषा कम्पयूटर  की,
कोई भी नहीं बिशेष बनी|
पर हिन्दी ही वह भाषा है ,
जो क्म्प्यूटर को श्रेष्ट मिली|

कम्प्यूटर के डाटासंग्रह में,
जितना भी डाटा अंकित है|
वह दो अंकों का खेलमात्र ,
वह दो अंकों से निर्मित है|

लगभग मिलताजुलता है यह्,
वैदिक -गणना के रंगों  से|
हो जाता सार्थक वेद-गणित ,
कम्प्यूटर की सभी तरंगों से|

यह सिद्ध हो गया है भाषा,-
कम्प्यूटर -मानक हिन्दी है|
हिन्दी ही विश्वसमन्वय की,
प्रोद्योगिक भाषा हिन्दी है|

भारत-वासी


      भारत-वासी
            -डा.राज सक्सेना

हजारों कष्ट सहते हैं,  जिगर को थाम लेते हैं |
मिले तकलीफ कितनी भी,सब्र से काम लेते हैं |
बहा देंगे पसीने में,हम अपनी मुश्किलें जो हों,
सतत कांटों पे चलकर हम,मंजिलें थाम लेते हैं |
पले हैं कष्ट सह-सह कर,हजारों साल से हम सब,
न हो बिस्तर तो धरती से,पलंग का काम लेते हैं |
बदन फौलाद का पाया,मगर दिल मोम का अपना,
अगर इज्जत पे बन जाए,गिरेबां थाम लेते हैं |
नहीं तोला है रिश्तों को,कभी ज़र की तराज़ू में,
कि खाकर घास की रोटी,विजय परिणाम देते हैं |
रहे सदियों से कष्टों में,मगर गर्दन न झुकने दी,
जिओ और"राज"जीने दो,कथन अंजाम देते हैं |

    घनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)

बुधवार, 27 जुलाई 2011

hindi hai prodyougik bhasha

 विश्व बना है एक ग्राम सा,
एक बने इसकी भाषा  |
विद्यमान हिंदी में यह गुण,
बने प्रोद्यिकी  की भाषा  |

प्रोद्यिकीग्रहण-संप्रेषण क्षमता ,
सबसे ज्यादा  हिंदी में |
पूर्व और इस दौर रचे नौ-,
लाख शब्द हैं ,हिंदी में |

कंप्यूटर की वैज्ञानिक भाषा,
शून्य, एक की है भाषा |
शून्य दिया भारत ने सबको,
हिंदी प्रौद्योगिक है भाषा |

काम करें हिंदी में हम तो ,
कंप्यूटर हिंदी बोलेगा |
हम हिंदी भाषा में खोलें,
तब यह हिंदी ही खोलेगा |

बिशेषज्ञ कुछ जुटे हुए हैं,
सुगठित कोड बनाने को |
रोक नहीं पायेगा कोई,
हिंदी प्रोद्यौगिक बनजाने को |

धनवर्षा, हनुमान मंदिर,
खटीमा-२६२३०८ (उ.ख.)
मो. 09410718777




मंगलवार, 26 जुलाई 2011

मातृभाषा पर जिसे अपनी न स्वाभिमान है |
राष्ट्रभाषा के प्रति,मन में नहीं  अधिमान है |
है अधमपशुवत जिसे ना,शीर्ष पर हो राष्ट्रप्रेम,
सम्पदामय् हो भले, किंचित नहीं श्रीमान है |
                - डॉ. राज सक्सेना


मातृ एंव राष्ट्र-भाषा,राष्ट्र- प्रेम  रख   मूल |
हों निर्णय और कर्म सब स्वाभिमान अनुकूल |
                - डॉ. राज सक्सेना 

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सोमवार, 25 जुलाई 2011

    उत्तराखण्ड प्रदेश गीत 
            - डॉ.राज सक्सेना

भरत भूमि,भव भूति,प्रखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

सकल-समन्वित श्रमशुचिताम |

शीर्ष सुशोभित,  श्रंग-शताम |
विरलवनस्पति, विश्रुतवैभव-,
पावन पुण्य-प्रसून   शिवाम |

हरितहिमालय,हिमनद्-खण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

नन्दा- नयना, पंच् -प्रयाग |
भक्तिभरित,भव्-भूति प्रभाग |
अन्नरत्न- आपूरित, आंगन-,
त्तरल-तराई,  तुष्ट - तड़ाग् |

तपोनिष्ठ- त्तप-भूमि  प्रचण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

गिरिजाघर, श्रुत-श्रेष्ठ- विहार |
कलियर,  हेमकुण्ड, हरिद्वार |
परमप्रतिष्ठित ,चतुष्धाम्-मय-,
पावन - द्वैनद् पुलक- प्रसार |

धवल-धरा-ध्वज, धर्मप्रखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

सर्वधर्म, समुदाय - निवास |
सत्य, शौर्य, शुचिता-श्रेयास |
पावन्-प्रेम, परस्पर- पूरित ,
मूल सहित,श्रमशील- प्रवास |

भ्रातृ-भाव भवभक्ति  अखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

  

शनिवार, 23 जुलाई 2011


      उज्जवल -उन्नत -उत्त्तराख्ण्ड
                    - राज सक्सेना

पावन , पुण्य-प्रसून ,प्रखण्ड |
उज्जवल -उन्नत -उत्त्तराख्ण्ड |

सफल समन्वित्-श्रमशुचिमान |
गण्-गौरव ,  गंगा-गतिमान |
विरल्-वनस्पति,विश्रुत वैभव्-
वनधन,पशुधन  श्री-श्रुतिमान |

मधुमहिमा -मन्डित सत्-खण्ड |
उज्जवल -उन्नत -उत्त्तराख्ण्ड |

नन्दा,नयना, नवल - प्रयाग |
भावभूमि, भवभरित - प्रभाग |
अन्न -रत्न  आपूरित  आंगन ,
तन्मय -तरल , तराई -भाग |

धवल धरा, ध्वज-धर्म अखण्ड |
उज्जवल -उन्नत -उत्त्तराख्ण्ड

सर्व-सुलभ , श्रुत-श्रेष्ठ  विहार |
हिममय   हेमकुण्ड    हरिद्वार |  
परम प्रतिष्टित - चतुष्धाम से ,
पावन द्वै-नद्  पुलक    प्रसार |

पावस प्रचुर , प्रकल्पित खण्ड |
उज्जवल -उन्नत -उत्त्तराख्ण्ड

सर्व-ध्रर्म , समुदाय - निवास |
शौर्य ,सत्य, शुचिता -सम्वास |
प्रेम - परस्पर , पावन-पूरित ,
मूल सहित ,  श्रमशील प्रवास |

भ्रातृ-भाव ,भव -भूमि अखण्ड |
उज्जवल -उन्नत -उत्त्तराख्ण्ड

  धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
खटीमा-२६२३०८(उत्तराख्ण्ड)
मो० - ०९४१०७१८७७७

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011


       लम्बी है स्याह रातें
                 - डा० राज सक्सेना
लम्बी हैं स्याह रातें, घनघोर सवेरे हैं |
मुद्दत से ये लगता है, हर ओर अन्धेरे हैं |
हो आम-ओ-खास जो भी,जीता है अन्धेरों में,
अन्जाम ये उन सबके, करतब जो उकेरे हैं |
कुछ पाप जमाने से, पाये हैं विरासत मैं,
जो हमने चुने सबही, लगता है लुटेरे हैं |
मछली सा हमें अबतक,समझा है जमाने ने,
जालों को लिये दुबके,हर ओर मछेरे हैं |
कितना भी छटपटायें,सम्भव नहीं निकलना,
मजबूत दिवारों से, हमसब को यूं घेरे हैं |
 हुस्न क़ी मलिका से,कहदो कि नहीं निकले,
हाथों में लिये बीनें, हर ओर सपेरे हैं |
ढॉचा हुआ है जर्जर, अब लाइलाज हैं सब,
दीमक चटी दिवारें, घुन खाए मुंडेरे हैं |
हो "राज्" अब बगावत, बदलेगी चाल वरना,
देने को नस्ले-नौ को, अब सिर्फ अन्धेरे हैं |

  धनवर्षा,हनुमान मन्दिर खटीमा-२६२३०८
   उत्तराखण्ड    मो०- ०९४१०७१८७७७

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

sankshipt parichhy

              संक्षिप्त परिचय 

नाम- डा. राज सक्सेना ( डा.राज किशोर सक्सेना`राज `) जन्म  तिथि- 09 जून ,1945
शिक्षा- एम् .ए.(स.शा.), साहित्य विशारद,विद्या सागर 
विशेष- विनायक  विश्वविद्यालय में डा.राज किशोर सक्सेना `राज` के बाल साहित्य पर दो लघु शोध (एम्.फिल) में सेवा- वर्ष 1965 से 2005 तक उ .प्र. एवं उत्तराखंड शासन के अधीन प्रशासनिक सेवा | 2005 में सहायक नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून पद से सेवा निवृत |
साहित्य सेवा- बालसाहित्य में पांच  कविता संग्रह प्रकाशित | कुछ को छोड़ कर लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में 
बाल कवितायें , गज़लें,गीत, हास्य-व्यंग्य कवितायें तथा आलेख प्रकाशित |
सम्मान - विभिन्न संस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय, प्रदेशीय तथा स्थानीय स्तरों पर पच्चीस से अधिक सम्मान | नेपाल में भी तीन बार सम्मानित |
सहभागिता- नेपाल,अंडमान निकोबार ,दिल्ली,उड़ीसा , मध्य प्रदेश, उ .प्र .,राजस्थान,हरियाणा ,महाराष्ट्र आदि 
में अनेकों बार सम्मानित |
सहभागिता- नेपाल, राष्ट्रीय एवं विभिन्न प्रदेश स्तरीय सम्मेलनों में सभागिता |
विशेष सम्मान - सेवा काल में राष्ट्रपति सम्मान |
सम्पर्क- धन वर्षा , हनुमान मंदिर, खटीमा-262308 (उत्तराखंड)
दूर- ध्वनि संपर्क - टेली- 05943252777  मो.- 09410718777 ,  08057320999 .
ई मेल  -  raajsaksena@gmail.com    

pradesh geet-3

        प्रदेश गीत 
              - डा. राज सक्सेना

पावन परम , प्रकल्पित खण्ड |
उन्नत ,उज्जवल , उत्तराखण्ड |

सकल समन्वित, श्रम्-शुचिताम |
शीर्ष-सुशोभित् श्रंग-  शिवाम |
विरल-वनस्पति,विश्रुत्-वैभव ,
भरत्-भूमि, भव-भूति,सुधाम |
पावस पर्यावरण, प्रखण्ड |
उन्नत ,उज्जवल , उत्तराखण्ड |

नन्दा,नयना, पंच-प्रयाग |
भक्ति-भरित,भव्-भूतिप्रभाग |
अन्न-रत्न-आपूरित आंगन,
तरल-तराई,तुष्ट -तड़ाग |
मधु-मन्डित,महिमामयखण्ड |
उन्नत ,उज्जवल , उत्तराखण्ड |

श्रेष्ठ-चर्च,श्रुत-श्रेष्ठि-विहार |
कलियर,हेमकुण्ड,हरिद्वार |
परम-प्रतिष्ठित,चतुष्धाममय,
पावन-द्वैनद-पुलक प्रसार |
हिममन्डित, हिमगिरिहिमखण्ड |
उन्नत ,उज्जवल , उत्तराखण्ड |

सर्व-धर्म,समुदाय-निवास |
सत्य,शौर्य,शुचिता-श्रेयास |
पावन-प्रेम,परस्पर पूरित,
मूल सहित, श्रमशीलप्रवास |
भ्रात्रभाव,भवभक्ति अखण्ड |
उन्नत ,उज्जवल , उत्तराखण्ड |
   
    धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
  खटीमा-२६२३०८(उत्तराखण्ड)

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

itihas bnayen

          इतिहास बनाएं 
                       - राज सक्सेना 
उठो चलो इतिहास बनाएं |
धरती से नभ तक छा जाएँ |

हम बच्चे हैं सब धर्मों के , 
मिल कर रहना कर्म हमारा |
भारत माता इष्ट हमारी,
राष्ट्र धर्म है  धर्म  हमारा  |
इसके हित सबसे टकराएँ,
उठो चलो इतिहास बनाएं               |

एक लक्ष्य है, एक लगन है,
कैसे श्रेष्ठ बनाएं भारत |
चंदा,सूरज सा देशों में ,
जगमग हम चमकाएं भारत |
हम इसको स्तुत्य बनाएं,
उठो चलो इतिहास बनाएं     

था इतिहास कभी ये अपना,
स्वर्णिम था ये देश हमारा |
उसी रूप में चमचम चमके,
रहे यही उद्देश्य  हमारा |
वहीं परिश्रम कर पहुंचाएं,
उठो चलो इतिहास बनाएं     

विज्ञानी बन नभ को छू लें,
पातालों तक मनभर  घूमें |
धरती पर हम स्वर्ग बनादें,
हर ऊंचाई को हम छू लें |
नये-नये प्रतिमान बनाएं,
उठो चलो इतिहास बनाएं     

नई-नई परतों को खोलें,
सिर्फ प्रेम की भाषा बोलें |
दीन-दुखी न रहे जगत में,
ऐसी सुंदर राहें खोलें |
एक सुखी संसार बनाएं,
उठो चलो इतिहास बनाएं       

खूब उगायें अन्न धरा पर,
शांति-अहिंसा रहे धरा पर |
घर-घर में उजियारा आये,
मने दिवाली रोज धरा पर |
भारत माँ को पूज्य बनाएं ,
उठो चलो इतिहास बनाएं       

 - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर,
खटीमा-262308 (उ.ख)
 मो- 09410718777

          |

गुरुवार, 30 जून 2011

aik ghr chahiye

                    एक घर चाहिए 
                                 - राज सक्सेना 

स्वप्न अपने पूर्ण करने, सबको एक घर चाहिए |
मैं परिंदा हूँ मुझे उड़ने को,       दो    पर    चाहिए |
फ़िक्र-ए-जनता में लगे , रहते हैं सारी उम्र वो- ,
नाश्ते से हर डिनर तक, मॉल  सब तर    चाहिए |
यूँ तो हैं त्यागी पुरुष, दौलत से इनको  काम क्या,
अपने दस्खत तब करेंगे, पहले तै   जर   चाहिए |
काम तब आतीं दुआएं, साफ   दिल  से हों  अता ,
साथ में दरिया-दिली और, चश्म-ए -तर   चाहिए |
इन्सान में खामी न हो , ये तो कभी     होता   नहीं ,
भगवान न बन जाये इन्सां, रहना  कसर  चाहिए |
उड़ते-उड़ते थक कर गिरुं बस,तेरे घर के सामने,
`राज` पल भर ही सही, मुझको भी तो दर चाहिए |

  - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 (उ.ख)
                           मो- 09410718777

बुधवार, 29 जून 2011

roshni ke pl jga

                  रौशनी के पल जगा 
                                - राज सक्सेना 

उठ अँधेरी  रात में कुछ ,  रौशनी  के  पल     जगा |
जिस तरह सम्भव बने,एक जगमगाता कल बना |
स्वप्न क्या-क्या रातभर,सब देखते हैं     नींद   में,
उठ खड़ा हो सत्य की,  उनमें कहीं  कोंपल     लगा |
लोग चलते फिर रहे हैं, धूप  से तन   को      बचा,
धूप से जब हों विकल तब, छाँव का आंचल   सजा |
हो नरम धरती तो आकर, हल चलाना  बात  क्या,
ढूंढ़ कर ऊसर धरा पर, वीर बन कर     हल    चला |
लोग  जब गिरने लगें तो, किस कदर जाते हैं गिर,
जब पतन सम्भव लगे तो, हो खड़ा उठ कर   दिखा |
सह रहे हैं मौन रह कर , अब भी शोषण लोग क्यों,
`राज` अब शोषण नही, कहना उन्हें   केवल  सिखा |

  - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 (उ.ख)
                                 मो- 09410718777

मंगलवार, 28 जून 2011

ujjvl unnt uttrakhand-2

                                  उन्नत -उज्ज्वल -उत्तराखंड 
                                                              - राज सक्सेना 
सफल-समन्वित,श्रम शुचितालय,
शीर्ष-सुशोभित,  श्रंग -शिवालय   |
विरल-वनस्पति,     विश्रुत-वैभव,
वन धन , पशु धन पूर्ण हिमालय  |
                                 पावस- प्रचुर, प्रकल्पित खंड,
                                 उन्नत -उज्ज्वल -उत्तराखंड |
भाव-भूमि,      भव-भरित प्रभाग,
नंदा,   नयना,            पंच- प्रयाग |
अन्नरत्न  - आपूरित ,      आंगन ,
तन्मित-तरल ,       तराई - भाग  |
                                पावन , पर्यावरण  -  प्रखंड,
                                उन्नत -उज्ज्वल -उत्तराखंड |
कुसुमित-कलियर , कनक-विहार ,
हिममय- हेमकुंड ,           हरिद्वार |
परम- प्रतिष्ठित    चतुषधाम    से,
पावन - द्वैनद   ,       पुलक-प्रसार |  
                                मधु-मंडित, महिमा सचखंड,
                                उन्नत -उज्ज्वल -उत्तराखंड |
सर्व-धर्म,  समुदाय  ,   निवासित ,
शौर्य, सत्य, शुचिता- सहवासित  |
प्रेम- परस्पर ,    पावन-पुलकित ,
मूल-प्रखर ,   गतिशील-प्रवासित |
                                भ्रात- भाव ,भव-भूमि अखंड,
                                उन्नत -उज्ज्वल -उत्तराखंड |

            -धन वर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उत्तराखंड) 
                                       मो- 09410718777

रविवार, 26 जून 2011

26nvri

                    छब्बीस जनवरी 
                                   - राज सक्सेना 
भिन्न सभी से, सबसे न्यारा,भारत का गणतन्त्र हमारा |
बना विश्व में श्रेष्ठ सभी से ,  हमें जान से है यह   प्यारा |
२६ जनवरी का स्वर्णिमदिन, लेकर खुशियाँ आया अनगिन,
इस दिन से मुड कर न देखा, करता देश तरक्की प्रति दिन ,
देख रहा विस्मित जग सारा, भारत का गणतन्त्र  हमारा |

अंतिमजन तक किया समर्पित,किया प्रशासन जनको अर्पित,
दलित-शोषितों को नियमों से, मिली शक्तियाँ श्रेष्ठ अकल्पित ,
पहुंची हर घर तक धारा ,   भारत का गणतन्त्र    हमारा  |

हुयी शक्तियाँ संवैधानिक,  लिखित हो गयीं सब अधिकाधिक,
संविधान अति श्रेष्ठ बना कर, संसद से करवाया   पारित ,
जग में ज्यों चमका ,धुर्व - तारा, भारत का गणतन्त्र हमारा |

शासन जन का , जन के द्वारा, है सशक्त प्रतिनिधि हमारा,
नियम बनाना, राज चलाना, उसमें सिमट गया बल सारा ,
शासक-शासन सभी संवारा ,  भारत का गणतन्त्र हमारा |

     - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308

hindi gjl

                               हिंदी गजल 
                                            - राज सक्सेना 
अब तो पारे सी चमकती, हो गयी हिंदी गजल |
मस्त हिरनी सी मचलती,हो गयी हिदी गजल |
दुख्तर-ए-दुष्यंत ने, अब पर निकाले देख लो,
आस्मां की एक परी सी , हो गयी हिंदी गजल |
लेके उर्दू से नफासत , माधुर्य अपना डाल कर,
क्या नशीली बन गयी है, अब नयी हिंदी गजल |
मीर ,ग़ालिब की चहेती, फैज़ के दिल की अज़ीज़,
सबकी चाहत पाके सबकी, हो गयी हिंदी गजल |
तन से हिंदी,मन से हिंदी,ले के  हिंदी    आत्मा,
गोद में हिंदी     के बैठी,  हो गयी    हिंदी गजल   |
शब्द अपने, भाव अपने, छंद भी    अपना तो है,
`राज` अब सबकी चहेती , हो गयी हिंदी गजल |

      - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 

mere mn ko

                 मेरे मन को 
                             - राज सक्सेना 
अधर रसपान प्रियतम का, लगा अमृत मेरे मन को |
युगों की प्यास का तर्पण, हुआ अनुभव मेरे तन को |
सभी में कुछ न कुछ कमियां, नहीं कोई कमी तुम में,
सहेजा जिस तरह तुमने, उठी हर एक उलझन    को |
हमें भर पूर जीना है, जियेंगे हम हर एक पल   को,
सिमटकर क्यों जियें करलें ,गठित मजबूत बंधन को |
सुलगती प्यास इस तन में, मगर मन वर्जना में है,
चलो अब खत्म कर दें हम,अजब इस एक अनबन को |
मिलन की कामना मन में, कसक बन कर न रह जाये,
उठो हम एक कर डालें, क्षुधित हो तप रहे      तन को |
न रोको अब करो निश्चय, समा जाओ  मेरे तन में ,
बनाएं `राज` मन्दिर हम, भटकते फिर रहे मन    को |

          - धन वर्षा, हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308

ayodhya faisla

                अयोध्या फैसला 
                                        -राज सक्सेना 
तीन जजों ने कर दिया, निर्णय नया प्रवीन |
पड़ी विवादित भूमि के, करदो हिस्से   तीन |
करदो हिस्से तीन,     बराबर    बाँटो   भाई ,
बना मूंछ का प्रश्न , लड़ो मत छद्म     लड़ाई |
कहे`राज कविराय`,फटे दिल फिरसे  जोड़ो,
`कुटिल धर्म निरपेक्ष,`व्यक्ति से नाता तोड़ो |

हुआ बाबरी का इधर, मुर्दा   तेरह       तीन |
कुटिल साम्प्रदायिक प्रखर,लगे बजाने बीन |
लगे बजाने बीन,  नाग को पुनः जगा   कर,
कर दें मटियामेट , खीर में नमक मिला कर |
कहे`राज कविराय`, राष्ट्र  की    करो भलाई ,
प्रेमभाव की जमी जड़ें, मत खोदो      भाई  |

हाशिम ने दिखला दिए, दिन में   तारे देख |
एक नये इतिहास के, लिखता है अब  लेख |
लिखता है अब लेख, लाभ लडवा  कर लेते ,
उन लोगों को हाशिम ने दिखलाये      ठेंगे |
कहे `राज` हाशिम सपूत ने, पंख    लगाये ,
शायद मसला साथ बैठ कर   हल हो  जाये |

तीनों न्यायाधीश थे,   पके-गुने  श्री  मंत |
हिन्दू-मुस्लिम एक हों,लिए साथमें  संत |
लिए साथ में संत, दूर की दुविधा     सारी,
किन्तु विषैले नाग,कर रहे  पुनः  तैयारी |
कहे `राज कविराय`,नहीं अब चलने वाली,
भस्मासुर की चाल, पड़ेगी उन पर   भारी |

दुष्ट व्यक्ति कहने लगे, निर्णय नहीं सटीक |
प्रथम आस्था-द्रष्टया,मुद्दे सुने   न     ठीक |
मुद्दे सुने न ठीक , इन्हें   कैसे   समझाओ ,
दादा इनके वही,इन्हें क्या सनद दिखाओ |
कहे`राज कविराय`,खेत की नहीं जमीं थी |
पूर्ण देश की भक्ति भावना,वहीं जुडी     थी | 

सुनो मुलायम सब रहो, नहीं तनो इस वख्त |
कुटिल चाल से इस समय,कब्र मिले न तख्त |
कब्र मिले न तख्त,  हाथ  से  दोनों      जाएँ ,
इश्वर और अल्लाह ,घ्रणा  करने   लग  जाएँ |
कहे`राज कविराय`, त्रिशंकू  मत  बन   जाना,
जाग रहा सद-भाव, पुनः  मत  आग   लगाना |

   - धन वर्षा, हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308
          मो- 09410718777

is devbhumi ki dhrti pr

                इस देव भूमि की धरती पर 
                                        - राज सक्सेना 
इस देवभूमि की धरती पर, पानी सा रक्त बहाया है |
इस महादान के बदले  ही, यह अलग राज्य बन पाया है |
तडपे घंटों तुम पड़े-पड़े, ज़ालिम शासन की छाया में ,
उत्तराखंड पर हो शहीद , तुमने इतिहास बनाया है |

हम आज तुम्हारे ही कारण, जीवन के सब सुख पाते हैं,
हो कर शहीद, नवजीवन दे, तुम गये, भूल कब पाते हैं,
यदि होते बीच हमारे तुम , तब दृश्य देख ये भी  लेते,    
 प्रति वर्ष सितम्बर पहली को, रस्में हर  वर्ष निभाते हैं |

बदले में यह कण मात्र नहीं, जो तुमने किया निराला था,
ये भगत सिंह, अशफाकुल्ला, के बलिदानों की माला  था ,
जो शून्य बना न रहने से, प्रतिपूर्ति नहीं हो सकती है,
इस महा समर में तुमने तो,सर्वस्व होम कर डाला    था |

जो सपना देखा था तुमने, वह पूर्ण कभी कर पायेंगे ,
क्या उन सपनों के भवनों को, हम मूर्त-रूप दे पाएंगे,
आओ आह्वान करें मिलकर, हम सपने पूरे करने का,
हर हाथ बढ़े निर्माण हेतु, सपनों का महल बनायेंगे |

केवल नारे और बातों से, सद कार्य नहीं हो पाते हैं,
जो दृढ निश्चय लेकर चलते, पर्वत पर राह बनाते हैं,
बाधा आये संकट आये, रुकना अब तो मंजूर  नहीं
कायर चलते नीचे झुक कर, सर सबके वीर झुकाते हैं |

बलिदान मांगते समर सभी, क्या हमने खून बहाए  हैं,
जो चले शहादत के पथ पर, क्या गीत उन्हीं के गाये हैं,
बलिदान हुए हैं हम पर जो, उनके प्रति  पल भर रुक कर,
क्या अश्रु  कणों के संग कभी, श्रद्धा के सुमन चढाये हैं |

                                        - धन वर्षा, हनुमान मन्दिर,
                                          खटीमा-262302
                                          मो- 09410718777

मंगलवार, 21 जून 2011

jo apna ho


                    जो अपना हो 
                             - राज सक्सेना 
न हो कागज का एक टुकड़ा,न मिलती रोशनाई हो |
जहाँ पढने को बच्चे ने,       दिया-बाती न  पाई  हो |
संभाला होश, खाने को ,    जहाँ खुद ही   कमाना है,
बताओ `राज` इस माहौल में,    कैसे पढ़ाई      हो   |

अँधेरे मुंह पड़े उठना ,     न मेहनत रंग  लाती    हो |
जहाँ फुटपाथ पर सबकी ,  उम्र ही बीत जाती     हो |
बड़ी थोड़ी हुयी लडकी,      सजा कोठे पे       दी    जाये,
इनिं के वोट से भारत में जब सरकार      आती    हो |

नहीं मिलता hai  बहुमत तो,  ये शातिर फन दिखाते हैं |
हजारों देके प्रलोभन,         ये बहुमत     खींच     लाते हैं |
रखेंगे क्रीम के पद    और  ,   पी एम् भी इन्हीं का हो,
ये कह आदेश जनता   का, स्वयम तिकडम भिड़ाते हैं |
इसी सरकार   के   मंत्री ,  खरब    में       घूस      खाते  हैं |  
और इस पैसे    को  वे     स्विस बैंक   में जाकर  छिपाते हैं |
जहाँ   दस लाख   के  पर्दे , बदलवाते    हों     मंत्री       जी,
वहाँ   बच्चों में दस में नौ ,  विरासत भूख      पाते        हैं |

बड़े    विश्वास    से    हमने ,   इन्हें     स्वराज     सौंपा  था |
बना   दें    राम के     जैसा,  इसी     हित ताज    सौंपा  था |
मगर बदले         में       हमको ये ,   तबाही   भूख    देते हैं ,   
जिन्हें हमने मुकद्दर का ,  हर एक       आगाज़  सौंपा था |

उठो उठ     कर लगा     दो आग,  इनके      आशियाने को |
इन्हें अपनी तरह      कर दो ,     गिरा दो हर ठिकाने को |
तड़पने    दो     इन्हें      भूखा,     तभी ये    दर्द     समझेंगे ,
तुम्हारा अंश इसमें     hai  ,  मंगाओ स्विस खजाने को |

उसे दो तख्त दिल्ली का ,      समझता दर्द सबका हो |
जो हिंदी          और हिदुस्तान को अपना समझता हो |
समझता  हो जो बिच्छू - सांप सा,     पैसा हो   सरकारी ,
विचारों से जो भारत का ,  सही अर्थों    में अपना हो |

यही हो बस विकल्प अपना, यही बस `राज`  सपना  हो |
वही     neta     बनेगा     अब ,  हितैषी आम जन का हो |
हम अपने वोट की ताकत ,  अब इनको ही दिखायेंगे,
हटा कठपुतलियाँ,     अब हम उसे लायें जो सबका हो |
                              
                                              - धन वर्षा ,हनुमान मन्दिर,
                                         खटीमा- २६२३०८ ( उत्तराखंड)

सोमवार, 13 जून 2011

ramdev bnam mnmohn-2

जब तक हम सरकार हैं, नहीं लायेंगे  नोट |
हम हैं पक्के     बेशर्म, कितनी      मारो  चोट  |
कितनी मारो चोट, नई नित हांके       जाएँ,
`सांप्रदायिकहिन्दूकार्ड`,नए नित खेले जाएँ |
कहे`राज कविराय`,    चुना   तो कष्ट उठाओ , 
हम खाते हैं मॉल , मियां तुम लातें खाओ |


कठपुतली पी एम् रखा, धागे रख कर हाथ |
पीएम्ओ में चल रहा, दस जनपथ  का साथ |
दस जनपथ का साथ, दुष्टता  की हद कर दी ,
राष्ट्र शत्रु की तरह चढाई, जन पर      कर दी |
कहे `राज कविराय`, राष्ट्रहित रख कर    आगे,
राष्ट्रप्रेम रख प्रथम, तोड़ पी एम् सब      तागे |

                              हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308

ramdev bnam mnmohn

                       राम देव बनाम मनमोहन
                                            - राज सक्सेना
जनपथ ने भरदी हवा, मनमोहन हो क्रुद्ध |
दिग्गी मुख ले लड़ रहे राम देव से युद्ध |
राम देव से युद्ध , पुलिसिया लट्ठ बजाते,
कर कायर का काम, नीचता उचित बताते |
कहे`राज कविराय`, अरे डायर    के     नाती,
पुलिसकमिश्नर गुप्ता तुझको शर्म न आती |

भ्रष्टों की सरकार क्यों,      लाये   काले  नोट |
राष्ट्र कर्म में लग रहा,  दुष्ट जनों को खोट |
दुष्टजनों को खोट,   बहाने    नित्य     बनाते |
सुप्रीमकोर्ट के हुक्मों को भी धता    बताते |
कहे`राज कविराय`, मॉल सब जो भी खाया,
कैसे वापस लायं, इन्ही ने जमा       कराया |

शुक्रवार, 10 जून 2011

mhapran nirala

                 महाप्राण निराला 
                                           -राज सक्सेना 

थे `समरेखा` से सरल हृदय,वक्री स्वभाव के नायक तुम |
लय से कविता में प्राण फूंक, थे जन-कविता के गायक तुम |
व्यक्तित्व अलग था कविता का, जो मेल कहीं पर खा न सका,
कविता में क्रांति मशाल लिए, थे नवकविता सम्वाहक तुम,


समझा अछूत तुमने कंचन, परित्याग निराला था तेरा |
जो जैसा था रखना सम्मुख, सम्भाग निराला  था   तेरा |
स्वान्त: सुखाय लेखन तेरा, जन-जन का लेखन बना सदा,
हर विधा अतुल थी जीवन की, हर भाग निराला था तेरा |


व्यक्तित्व निराला सूर्यकान्त, कविता का रूप निराला था |
सपने रच कर विक्रय न किये, तू स्वयमसिद्ध मतवाला था |
मदमस्त रहा हाथी जैसा, विचलन पथ से अपने न किया,
हे महाकवि, साहित्य-रथी,एक युग तूने रच डाला था  |


जब तूने वर्षागीत लिखा, आया बसंत में भी अषाढ़ |
हर विरहगीत में भर कर करुणा, पिघलाए कितने ही पहाड़ |
तुम हंसे-हंसी जनता सारी, रोए तो जनता रोती थी ,
हे महाश्रेष्ठ ,जनता के कवि, तुम कवियों में थे महाप्राण |
                                 -धनवर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308

inayat ho rhi hai

                इनायत हो रही है
                                    - राज सक्सेना

गरीबों पर इनायत हो रही है |
भिखारी  सी सखावत हो रही है |
लूट कर टेक्स हम गरीबों से,
पडौसी की, समाअत हो रही है |
गरीबों को सडक पर छोड़ मरने,
मुफ्तखोरों की हिफाजत हो रही है |
हमीं को कह रहे कातिल, चला गोली,
खुली बेहद, सखाफत हो रही है |
थमा कर हाथ में दोनों के खंजर,
खुली बन्दर वकालत हो रही है |
दिया है हाथ में गैरों के आंचल,
सगी माँ की, तिजारत हो रही है |
जरा सी हिल गयी कुर्सी तो चीखे,
विरोधी  की शरारत हो रही है | 
मलामत हो रही है`राज` फिर भी,
नही क्यूँ अब, बगावत हो रही है |  

-          dhnvrsha ,  hnuman mndir,
       khtima-262308
      moba-09410718777
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